डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की इजाजत दे दी है। हालांकि कोर्ट ने इसके साथ कुछ शर्तें भी तय की हैं। हरीश एक एक्सीडेंट के बाद तकरीबन तेरह साल से कोमा में थे। वह ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब से सांस ले रहे और पेट में लगे पीईजी ट्यूब से क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन (CAN) के जरिए पोषण मिल रहा था। क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया? पैसिव यूथेनेशिया वह प्रक्रिया है जिसमें किसी टर्मिनली इल यानी अंतिम चरण की बीमारी वाले मरीज के जीवन को बनाए रखने वाले लाइफ सपोर्ट सिस्टम या ट्रीटमेंट को हटाया या रोका जाता है। इससे व्यक्ति की प्राकृतिक मौत हो जाती है।इसमें कोई सक्रिय कदम नहीं उठाया जाता, बल्कि जीवनसमर्थन प्रणाली (जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां) को बंद करके बीमारी को अपना कोर्स पूरा करने दिया जाता है। यह आमतौर पर तब किया जाता है जब मरीज की स्थिति में सुधार की कोई संभावना न हो और वह दर्द में हो। यह कई देशों में वैध है, क्योंकि इसे उपचार रोकने का अधिकार माना जाता है, जो मरीज की इच्छा या परिवार की सहमति पर आधारित होता है।भारतसंयुक्त राज्य अमेरिकानीदरलैंड्सबेल्जियमलक्जमबर्ग स्पेनब्रिटेन (UK)जर्मनीऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्य,कनाडा नोट: लिस्ट में कई देश ऐसे भी हैं जो पैसिव और एक्टिव यूथेनेशिया दोनों का मानते हैं। ये सूची पूरी नहीं है, बल्कि दुनिया के अहम देशों का नाम बताया गया है।एक्टिव यूथेनेशिया क्या होता है? एक्टिव यूथेनेशिया वह प्रक्रिया है जिसमें डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी मरीज के जीवन को समाप्त करने के लिए दवा या इंजेक्शन देते हैं, ताकि मरीज से मुक्त हो सके और गरिमामयी मौत का भागी बने। यह मरीज की स्पष्ट सहमति (voluntary) पर आधारित होता है और आमतौर पर टर्मिनली इल या असहनीय पीड़ा वाले मामलों में किया जाता है।यह दुनिया के अधिकांश देशों में अवैध है, क्योंकि इसे हत्या के समान माना जाता है। हालांकि, कुछ देशों में इसे सख्त शर्तों के साथ वैध बनाया गया है, जहां मरीज की उम्र, स्थिति, सहमति और चिकित्सकीय मूल्यांकन की जांच की जाती है।नीदरलैंड्स में 2002 से वैध एक्टिव यूथेनेशिया वैध है। यह दुनिया का पहला देश जहां एक्टिव यूथेनेशिया कानूनी है। इसके अलावा बेल्जियम, कनाडा, कोलंबिया, लक्जमबर्ग, स्पेन, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल, उरुग्वे, इक्वाडोर, ऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्य और स्विट्जरलैंड में भी एक्टिव यूथेनेशिया का अलग-अलग शर्तों के साथ प्रावधान है।भारत में पैसिव यूथेनेशिया ही क्यों माना जाता है? भारत में पैसिव यूथेनेशिया को 9 मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले (Common Cause v. Union of India) से वैध बनाया गया। इससे पहले 2011 में अरुणा शानबाग मामले में कोर्ट ने असाधारण मामलों में अनुमति दी थी, लेकिन 2018 का फैसला इसे मौलिक अधिकार बना देता है।सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हिस्सा माना था। जीवन का अधिकार गरिमापूर्ण जीवन और गरिमापूर्ण मौत दोनों को शामिल करता है। असहनीय पीड़ा में जीना गरिमा का उल्लंघन है। अरुणा शानबाग ने 42 साल तक कोमा में बिताया था कोर्ट ने कहा कि जीवन की गरिमा में मौत की प्रक्रिया भी शामिल है। टर्मिनली इल या पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में व्यक्ति को अनावश्यक पीड़ा से मुक्त करने का अधिकार है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों (जैसे UDHR और ICCPR) से प्रेरित है। हालांकि, एक्टिव यूथेनेशिया भारत में अवैध है।भारत में एक्टिव यूथेनेशिया को लेकर नैतिक पक्ष क्या है? एक्टिव यूथेनिशिया को भारत में लागू न करने के पीछे मुख्य कारण कानूनी, सांस्कृतिक और नैतिक बाधाएं हैं। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 या 304 के तहत इसे हत्या माना जाता है और सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के Common Cause मामले में केवल पैसिव यूथेनिशिया (लाइफ सपोर्ट हटाना) को ही अनुमति दी है।