आजादी की खुशी के साथ बंटवारे का दर्द भी सहा - News Summed Up

आजादी की खुशी के साथ बंटवारे का दर्द भी सहा


बरेली (ब्यूरो)।15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ तो हर तरफ जश्न का माहौल था। अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिलने की खुशी सभी महसूस कर रहे थे। तब मैं भले ही 13 वर्ष का था, पर मुझे यह याद है कि हमारे परिवार में भी जश्न मनाया जा रहा था। उस वक्त हमारा परिवार पाकिस्तान के लरकाना शहर में रहता था। वहां हम जमींदार थे और बड़ा कारोबार हुआ करता था। परिवार में संपन्नता और खुशहाली थी। आजादी के जश्न के बीच ही देश विभाजन की शॉकिंग न्यूज भी आ गई। उस वक्त खबरों का सोर्स आज जितना विकसित नहीं था, इसलिए यह खबर देर से पहुंची हम लोगों तक। इस न्यूज के बाद ही दुर्दिन शुरू हो गए। हालात खराब होने पर जब वहां से सभी लोग भागने लगे तो हमारा परिवार भी सब कुछ छोडक़र भारत की ओर कूच कर गया। ऐसे में हर किसी को एक ही बात की टेंशन थी कि वह अब कहां जाएंगे और कैसे दिन कटेंगें। मुझे याद है कि हमारा परिवार पाकिस्तान से हैदराबाद आया और फिर वहां से हमें अहमदाबाद भेजा गया। वहां बड़ी ही मुफलिसी के बीच हमारी परविरिश हुई। आज हम जिस मुकाम पर हैं, वह हमारे विपरीत परिस्थितियों से हार न मानने की जिद, संघर्षशील और मेहनतकश होने का ही परिणाम है। देश की आजादी के साथ ही विभाजन की विभीषिका के गवाह रहे 90 वर्षीय चेतन आयल सुंदरानी ने यह बातें रविवार को स्वतंत्रता दिवस की 77 वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर दैनिक जागरण आईनेक्स्ट को बताईं। इसके अलावा भी उन्होंने आईनक्स्ट से अपनी पुरानी यादें साझा की।1934 में हुआ जन्मउम्र के नौ दशक पार कर चुके चेतन सुंदरानी भले ही शारीरिक तौर पर बहुत दुर्बल हो चुके हों, पर देश की आजादी के बारे में बात करते ही वह जोश से भर उठे। यह जोश उनकी लड़खड़ाती जुबान और हाव-भाव से भी में झलकता है। उन्होंने बताया कि उनका जन्म पाकिस्तान के लरकाना में वर्ष 1934 में हुआ। उन्हें भली भांति याद है कि उनके परिवार का बड़ा कारोबार था। तब उनके परिवार की आटा चक्की हुआ करती थी। परिवार में हम दो भाई और पांच बहनें थीं। इसके अलावा चाचा-ताऊ का भी परिवार था, पर भारत आने के बाद हम सभी लोग बिछुड़ गए। परिजनों का बिछुडऩा भी हमारे लिए कोई कम विभीषिका नहीं रही।1947 में आ गए अहमदाबादचेतन सुंदरानी कहते हैं कि जब वह लरकाना में थे तो उनके एक सगे रिलेटिव सुग्नोमल गोपनानी पढऩे के लिए मुंबई आए थे। उसी दौरान उनकी दोस्ती यहां भगत नाम के सहपाठी से हो गई। भगत संपन्न परिवार के थे। जब पार्टिशन हुआ तो उनका परिवार भगत के कहने पर अहमदाबाद आ गया। वहां पर उन्हें रहने के लिए 40 गज का मकान दिया गया। अहमदाबाद के ढक्कर बाबा नगर में छोटा से मकान मिला, जिसमें वह परिवार के साथ रहने लगे। बहन महाराष्ट्र के उल्लास नगर, दो रायपुर और एक लखनऊ में रहने लगी। बताते हैं कि वह दो भाई थे। परिवार का बिखराव उनके लिए बड़ा दर्दनाक रहा।इंजीनियरिंग की पूरी की पढ़ाईचेतन सुंदरानी कहते हैं कि वह मेधावी छात्र रहे। उन्होंने मैकेनिकल और इलेक्टिकल से इंजीनियरिंग की। इसके बाद पहली जॉब अहमदाबाद में ही शुरू की। 1962 में जब बरेली में कैंफर फैक्ट्री लगी तो वह अपनी कंपनी के बॉस के साथ बरेली आ गए। बरेली की कैंफर फैक्ट्री में वह ग्रास रूट ऑफिसर रहे। तब वह इसी कंपनी की तीन फैक्ट्रियों के इंजीनियरिंग इंचार्ज भी रहे।बड़े उद्योगपति हैं सुंदरानीचेतन आयल सुंदरानी वर्तमान में सीबीगंज में मिनी बाईपास तिराहे के सामने अपने भतीजे सुरेश सुंदरानी के पास रहते हैं। सुरेश सुंदरानी उन्हें चाचा नहीं पिताजी ही मानते हैं। आज वह जो भी हैं और उनके पास जो कुछ भी है वह इन्हीं की बदौलत है। सुरेश सुंदरानी भी इंजीनियर हैं और उनकी यहां फैक्ट्री है। सुरेश सुंदरानी ने बताया कि उन्होंने भी अहमदाबाद के उसी कॉलेज से इंजीनियरिंग की जिस कॉलेज से उनके पिताजी ने की। सुरेश सुंदरानी के दो पुत्र हैं, जिनमें बड़े मनीष सीए हैं और छोटे कपिल एमएनसी में कम्प्यूटर इंजीनियर हैं।


Source: Dainik Jagran August 15, 2023 09:23 UTC



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