कविताएं बुधवार अंक - News Summed Up

कविताएं बुधवार अंक


मददगार बन हमको समझायाजब न्यूजपेपर ने हाथ बढ़ायालॉकडाउन में क्या है करना? ऊबी जिंदगी को मिला सहाराजब न्यूजपेपर ने हाथ बढ़ायाजग यह कैसे लड़ रहा है? क्या-क्या कहां पर चल रहा है? है घर पूरा भरा उनसे,जिन्हे कहते हैं अपनी जिंदगी,फिर भी ना जाने क्योंभीड़ की कमी-सी हैबस यूंही कुछ दिनों के लिएरुकी है शायद चाहतेंबिल्कुल, कुछ अलग ये दोपहरी-सी हैं!! खुशियों के कुछ पन्ने पुरानेबचपन के खेलों के दीवानेयादों की चादर को ओड़ेलौट आए किस्सों के जमानेहै खुबसूरत इतनी, और कितनी अपनी-सी है,हां, कुछ अलग ये दोपहरी-सी है!!


Source: Navbharat Times April 15, 2020 02:26 UTC



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