मददगार बन हमको समझायाजब न्यूजपेपर ने हाथ बढ़ायालॉकडाउन में क्या है करना? ऊबी जिंदगी को मिला सहाराजब न्यूजपेपर ने हाथ बढ़ायाजग यह कैसे लड़ रहा है? क्या-क्या कहां पर चल रहा है? है घर पूरा भरा उनसे,जिन्हे कहते हैं अपनी जिंदगी,फिर भी ना जाने क्योंभीड़ की कमी-सी हैबस यूंही कुछ दिनों के लिएरुकी है शायद चाहतेंबिल्कुल, कुछ अलग ये दोपहरी-सी हैं!! खुशियों के कुछ पन्ने पुरानेबचपन के खेलों के दीवानेयादों की चादर को ओड़ेलौट आए किस्सों के जमानेहै खुबसूरत इतनी, और कितनी अपनी-सी है,हां, कुछ अलग ये दोपहरी-सी है!!
Source: Navbharat Times April 15, 2020 02:26 UTC