आत्महत्या करने वाले इन किसानों में 70% से ज्यादा ऐसे छोटे किसान होते हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन होती है. और हां, किसानों के बीच से निकलकर जो लोकप्रतिनिधी संसद से लेकर विधानसभा या स्थानीय संस्थाओं में पहुंचे हैं वे किसानों की आवाज नहीं बन पाए हैं. किसानों को हर तरह की मदद करते हैं लेकिन हमारे देश के किसानों को जो मदद मिलती है वह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है. कभी बाजार से खाद गायब हो जाता है तो कभी ऐसे बीज किसानों तक पहुंचते हैं जिनका अंकुरण ही ठीक से नहीं होता है. महाराष्ट्र के किसान कभी हजारों टन प्याज सड़क पर फेंकने को मजबूर हो जाते हैं तो छत्तीसगढ़ के किसान टमाटर फेंक देते हैं.
Source: Dainik Jagran June 11, 2023 07:21 UTC