गुरुवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्य सभा चुनाव के लिए नामांकन के साथ ही प्रदेश की राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हो गया।बिहार के सत्ता के गलियारों में चहलकदमी करने वाले जितने भी लोगों से पिछले कुछ समय में बात हुई, उनमें से ज्यादातर का कहना है कि नीतीश जी की सेहत पर उम्र का असर दिखने लगा है।विपक्षी दल और कई बार सहयोगी भी दबे स्वर में, यह कहते पाए गये कि बिहार की सरकार अब सीएम के कुछ करीबी अधिकारी चलाते हैं। नीतीश कुमार के कुछ वीडियो भी ऐसे सामने आए जिन्हें देखने के बाद मुख्यमंत्री के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आशंका व्यक्त की गयीं।बिहार चुनाव में ताबड़तोड़ रैलियाँ करके नीतीश कुमार ने दिखाया कि वह शारीरिक रूप से उतने असहाय नहीं है जितना विपक्ष बता रहा है। मगर बातों या व्यक्तियों को भूल जाने या परिस्थिति को नजरअंदाज कर देने के कई सार्वजनिक प्रकरणों से यह भी साफ था कि वह मानसिक रूप से उतने स्वस्थ नहीं हैं जितने पाँच साल पहले तक थे।बिहार की राजनीति को करीब से देखने वालों के बीच यह बात साफ थी कि नीतीश कुमार का अवसान करीब है मगर वह कब और कैसे होगा, इसको लेकर केवल कयास लगाए जाते थे क्योंकि यह बात साफ थी कि नीतीश की मर्जी के बिना उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाना सम्भव नहीं है।स्वयं नीतीश कुमार ने अपने स्वास्थ्य को देखते हुए क्या एग्जिट प्लान बनाया है, यह किसी को नहीं पता था। गुरुवार को राज्य सभा के लिए नामांकन के बाद भी “नीतीश के बाद कौन?” के सवाल से पर्दा नहीं उठा है। न ही इस सवाल से पर्दा उठा है कि सीएम के बाद अब क्या बचा है नीतीश के लिए? मगर यह तय हो गया है कि बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलने जा रहा है।बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा और नीतीश कुमार केंद्र में कौन सा पद ग्रहण करेंगे, इन सवालों का जवाब केवल और केवल भाजपा आलाकमान और नीतीश कुमार को पता होगा मगर यहाँ एक दूसरे सवाल पर विचार करना जरूरी है।वह सवाल है कि क्या भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यू) नीतीश कुमार द्वारा खाली की गयी जगह को “सामाजिक न्याय” के फार्मूले से भरेंगे या जातिवादी वर्चस्व के समीकरण से! मुख्यमंत्री के तौर पर जीतनराम मांझी का करीब नौ महीने का कार्यकाल अपवाद मान लें तो बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पिछले 35 साल से केवल दो जातियों का कब्जा है। अगर 1990 से पीछे के 35 साल देखें तो 7-8 जातीय समुदायों के नेता मुख्यमंत्री बन चुके थे। यानी बिहार की राजनीति के शीर्ष पर सामाजिक गतिशीलता 1990 के बाद बाद रुक गयी है।1990 से पहले बिहार में सर्वाधिक मुख्यमंत्री ब्राह्मण समुदाय से बने मगर किसी का भी कार्यकाल उतना लम्बा नहीं था जिसकी तुलना लालू यादव परिवार या नीतीश कुमार के कार्यकाल से की जा सके।नीतीश कुमार और लालू यादव परिवार के बाद सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह रहे जो भूमिहार समुदाय से आते थे। यदि सभी ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को मिला लें तो आजादी से अब तक बिहार में ज्यादातर समय केवल चार जातियों (भूमिहार, ब्राह्मण, यादव और कुर्मी) का वर्चस्व दिखता है।अन्य जिन जातियों से राज्य के मुख्यमंत्री बने उनमें से किसी को चार साल तक कुर्सी पर रहने का अवसर नहीं मिला। यदि ऊपर की चार जातियों में अगड़ी मानी जाने वाली राजपूत और कायस्थ जातियों को जोड़ दें तो बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय में कुछ छह जातियों का वर्चस्व रहा है।नीतीश कुमार सरकार ने 2023 में जब बिहार का पहला जातीय सर्वेक्षण कराया तो उसमें 203 अधिसूचित जातियों का ब्योरा सामने आया। यानी बिहार की करीब 195 जातियों के लिए अपना मुख्यमंत्री देखना बाकी है।बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय में पिछले 78 साल में केवल छह-सात जातियों का वर्चस्व और पिछले 35 साल में केवल दो जातियों का वर्चस्व बताता है कि “सामाजिक न्याय” के ट्रिकल डाउन (नीचे उतरने) की गति थम सी गयी है।नीतीश कुमार ने एक सराहनीय लम्बी पारी खेलकर बिहार के चुनावी मैदान से जा रहे हैं मगर उन्हें अपनी विरासत सौंपते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि मुख्यमंत्री कार्यालय में इन्हीं चन्द जातियों का वर्चस्व कब तक बना रहेगा। ‘सामाजिक न्याय’ कतार में आठवें या नौवें या दसवें स्थान पर खड़े आदमी तक कब पहुँचेगा?
Source: NDTV March 06, 2026 15:24 UTC