सरकारें तो कोरोना पर जीत की घोषणा करके अपनी पीठ थपथपा लेंगी, जैसी पहली लहर के बाद थपथपाई थी, लेकिन भुगतना आखिर हमें ही है! हमने इतने अपनों, करीबियों और जान-पहचान वालों को गंवाया है कि गिनती करना मुश्किल है, लेकिन फिर भी सबकुछ भूलकर घूमने-फिरने हम कैसे निकल सकते हैं? कितनी भीड़ होती है वहां? इतनी कि पारोवार नहीं! वहां मौजूद लोग, हर पल हमसे टकराते, मिलते हैं। उन लोगों में से किसने वैक्सीन का पहला डोज लिया है और किसने दोनों, किसने लिया ही नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं। फिर भी आधे-अधूरे मास्क लगाकर फिरते लोगों के बीच जाने से हमें गुरेज़ नहीं है।वैज्ञानिक, डॉक्टर्स चेतावनी देते-देते थक गए हैं कि इस तरह भीड़ में जाना तीसरी लहर को न्योता देने जैसा है, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं। कोई मानने को राजी नहीं। आखिर जीवन हमारा है, और इसे बचाने की ज़िम्मेदारी भी हमारी ही है। सरकारों का हिसाब-किताब तो हम सब देख ही चुके हैं। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता!
Source: Dainik Bhaskar July 15, 2021 00:22 UTC