पूर्णिया [प्रकाश वत्स]। महज दो दशक पूर्व धमदाहा अनुमंडल क्षेत्र में माघी पूर्णिमा पर लगने वाला कौशिकी मेला की प्रसिद्धि पूरे कोसी व सीमांचल क्षेत्र में थी। कोसी की ही एक धारा के तट पर लगने वाले इस एक माह के मेले में दूर-दूर से दुकानदार व आम लोग पहुंचते थे। बाद में नदी की यह धारा पश्चिम की ओर सरकती चली गई और बाद में उस धारा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।नदी की उस धारा के साथ ही कौशिकी मेला भी इतिहास बन गया। कभी कल कल बहती लखीजान के किनारे पुल घाट पर लगने वाला प्रसिद्ध छठ मेला भी अब कल की बात हो गई है। नदी के सिकुड़ने व धारा के कमजोर पड़ने से मेला पर ग्रहण लग गया। इसी तरह शहर के करीब कारी कोसी पर चूनापुर घाट पर लगने वाला माघी मेला का नामोनिशान भी अब मिट चुका है।यह बानगी भर है। कोसी व सीमांचल इलाके में नदियों की धारा मुड़ने व कई नदियों के विलुप्त होने के कारण लगभग तीन दर्जन से अधिक प्रसिद्ध मेले का अस्तित्व अब समाप्त हो गया है।धमदाहा निवासी 65 वर्षीय बिमल चंद्र झा बताते हैं कि महज दो दशक पूर्व तक इस इलाके के लोगों को कौशिकी मेला का इंतजार रहता था। लोग बैलगाड़ी, ट्रैक्टर-ट्राली सहित अन्य साधनों से यह मेला देखने लोग पहुंचते थे। लोग रात में परिवार समेत वहां विश्राम भी कर लेते थे। तकरीबन दस एकड़ रकवा में इस मेले का फैलाव रहता था। एक-दूसरे गांवों के लोगों का यह मिलन स्थल हुआ करता था। अब सब कुछ समाप्त हो गया है। अमौर के परमानंद मंडल कहते हैं कि इस इलाके में भी कभी माघी पूर्णिमा व कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर कई स्थानों पर मेले लगते थे। खासकर परमान व कनकई के किनारे कई मेले लगते थे। बाद में नदियों की दिशा बदलती गई और फिर इन मेलों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। समाजशास्त्री मनोज कुमार झा मानते हैं कि मेलों के अस्तित्व पर संकट से हमारी संस्कृति प्रभावित हो रही है। कोट- नदियां सदा से संस्कृति की वाहक रही है। कोसी सहित कई नदियों के दशा-दिशा में बदलाव व छोटी नदियों के विलुप्त होने से कोसी व सीमांचल इलाके के तीन दर्जन से अधिक मेले का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। ये मेले कभी इस क्षेत्र का सांस्कृतिक धरोहर हुआ करता था।भगवान पाठक, शोध कर्ता, कोसी की नदियां।शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप
Source: Dainik Jagran July 03, 2021 18:33 UTC