रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती: झारखंड के जनजातीय समाज से रहा गुरुदेव का गहरा लगाव - News Summed Up

रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती: झारखंड के जनजातीय समाज से रहा गुरुदेव का गहरा लगाव


जासं, रांची: गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के ज्ञान, साहित्य, और सेवाभाव की छाप पूरे देश में किसी न किसी रूप में देखने को मिलती है। गुरुदेव का झारखंड से बड़ा जुड़ाव रहा। उन्होंने महाकाव्य गीतांजलि की कई कविताओं को झारखंड में रहने के दौरान लिखा था। रांची विवि के विभागाध्यक्ष डा. एनके बेरा कहते हैं कि गुरुदेव हजारीबाग, चक्रधरपुर और गिरीडीह गए थे। गिरीडीह में ही उन्होंने एकला चलो की बात कही थी। रांची के टैगोर हिल पर बने शांतिधाम में उनके बड़े भाई ज्योतिरींद्र नाथ ठाकुर रहते थे। उन्होंने ही शांतिधाम नाम दिया था। टैगोर हिल के संरक्षण के लिए काम करने वाले अजय कुमार जैन बताते हैं कि आज भी यहां उतनी ही शांति और आत्मसुख है जितनी ज्योतिरींद्र नाथ के वक्त थी। मोरहाबादी पहाड़ पर बनाया था ब्रह्म मंदिरकहते हैं कि मोरहाबादी पहाड़ी मोरहाबादी गांव के जमींदार बाबू हरिहर सिंह की जमींदारी में थी। ज्योतीरींद्र उनसे मिले और कुछ शर्तों पर 23 अक्तूबर 1908 में 15 एकड़ 80 डिसमिल जमीन पहाड़ी के लिए बंदोबस्त करायी। काफी खर्च कर इस पहाड़ी पर सीढि़यां बनवाई। सड़कें निकलवाई और ओसली के रेस्ट हाउस में आवश्यक परिवर्तन कर रहने लायक बनवाया। उन्होंने पहाड़ी पर ब्रह्म मंदिर बनवाया और उसे सभी धर्म और संप्रदाय के लोगों की आराधना और ध्यान के लिए स्वतंत्र रखा। यहां की खूबसूरती ऐसी थी कि लोग अपने आप यहां आकर ध्यान में चले जाते थे। गुरुदेव को जब डाक्टर साहब कहने लगे लोगगुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का जुड़ाव झारखंड के आदिवासी समाज से रहा है। बांग्ला के वरिष्ठ साहित्यकार डा. राम रंजन सेन बताते हैं कि गुरुदेव झारखंड के प्राकृतिक सौंदर्य से प्रभावित थे। उनकी पुत्री रेणुका जब बीमार पड़ीं तो वह उन्हें झारखंड में मधुपुर और गिरिडीह लेकर आए थे। अपने गिरिडीह प्रवास के दौरान उन्होंने शिवाजी उत्सव लिखा। उनको होमियोपैथी की अच्छी समझ थी। गिरिडीह प्रवास के दौरान उन्होंने कई बीमारों को होमियोपैथी के इलाज से ठीक किया। नतीजा यह हुआ कि लोगों ने उन्हें डाक्टर साहब कहना शुरू कर दिया। गुरुदेव ने छोटानागपुर का खूब भ्रमण किया। उन्होंने छोटानागपुर की प्राकृतिक सुंदरता पर एक लंबी कविता कैमेलिया लिखी। कहानी शेषकथा में संताली समाज को उन्होंने दिखाया है। उपन्यास राजर्षि में भी संताली समाज को उन्होंने केंद्र में रखा। जनजातीय लोकधुनों को उन्होंने रवींद्र संगीत में पिरोया। साथ ही, उनके लोकनृत्य की कई मुद्राओं को भावनृत्य से जोड़ा। उनके चित्रों में भी जनजातीय जनजीवन देखने को मिलता है।शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप


Source: Dainik Jagran May 07, 2021 03:00 UTC



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