मेरठ (ब्यूरो)। पॉल्यूशन की मार के चलते मेरठ की हवा हर साल तीन माह के लिए ऐसे खतरनाक स्तर पर पहुंच जाती है कि लोगों का सांस तक लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसा नही है कि पॉल्यूशन कंट्रोल के लिए बजट और योजनाएं नहीं है। हर साल भारी भरकम बजट के साथ नई-नई योजनाएं बनती हैं लेकिन पॉल्यूशन कंट्रोल नहीं हो पाता। इसी बाबत दैनिक जागरण आईनेक्स्ट द्वारा ए सिटी देट सफोकेट्स नाम से एक सात दिवसीय कैंपेन की शुरुआत की जा रही है। जिसमें रियल्टी चेक और फैक्ट्स के आधार पर ये जानने की कोशिश की जाएगी कि आखिरकार हर साल पॉल्यूशन कंट्रोल करने के सारे प्रयास विफल कैसे हो जाते हैंपेश है पहली किस्त।154 करोड़ रुपये खर्चगौरतलब है कि हर साल वायु गुणवत्ता का स्तर बद से बदतर होता जा रहा है। इसका का नतीजा है कि पिछले छह साल में वायु गुणवत्ता सुधार के लिए पानी की तरह पैसा बहाया गया। पिछले छह साल में प्रदूषण से निपटने के लिए केंद्र और राज्य से करीब 187 करोड़ रुपए नगर निगम को मिले थे। जिसमें से नगर निगम ने वायु प्रबंधन के नाम पर 154 करोड़ खर्च भी कर दिए। इतना ही नहीं, इस साल भी अभी तक निगम सवा करोड़ रुपया खर्च कर चुका है। बावजूद इसके शहर के एक्यूआई का एवरेज स्तर 350 के पार बना हुआ है। वायु प्रदूषण के कारण सेंट्रल पॉल्यूशन बोर्ड के आंकडों में नवंबर पूरा लाल यानि खतरे के मानकों से अधिक रहा और दिसबंर में भी अब तक 50 प्रतिशत से अधिक दिन प्रदूषण का लेवल खतरनाक स्तर पर बना हुआ है।साल निस्तारण पर हुआ खर्च (करोड़)2020-21 - 6.922021-22 - 20.662022-23 - 23.122023-24 - 67.122024-25 - 35.122025-26 - 1.12पानी छिड़काव तक सीमित प्रयासवायु गुणवत्ता सुधारने के लिए ग्रेडेड एक्शन रेस्पॉन्स सिस्टम भी काम नही आ रहा है। निगम द्वारा वायु प्रदूषण को कम करने के लिए पानी छिड़काव का एकमात्र सहारा लिया जा रहा है। हालांकि एंटी स्माग गन और वाटर स्प्रिंकलर मशीनें भी निगम के पास हैं लकिन उनका उपयोग सिर्फ वीआईपी इलाकों तक ही सीमित रहता है। जबकि दिल्ली रोड, गढ़ रोड, हापुड़ रोड, मवाना रोड, किला रोड पूरी तरह धूल और धुंए के गुबार में ढकी रहती है।ग्रीन बेल्ट का निकला दमशहर की हवा को प्राकृतिक रूप से शुद्ध करने के लिए शहर के अंदर ग्रीन बेल्ट विकसित करने में भी निगम नाकाम है। शास्त्रीनगर, विवि रोड, गढ़ रोड को छोड़ दें तो शहर में बेगमपुल से लेकर हापुड़ अड्डा, रिठानी से मेट्रो प्लाजा, मेट्रो प्लाजा से बेगमपुल जैसी मेन रोड और कनेक्टिंग रोड पर कहीं ग्रीन बेल्ट तक विकसित नहीं हो पाई है। इतना ही नहीं, धूल का प्रकोप कम करने के लिए सड़क किनारे इंटरलाकिंग टाइल्स बिछाने का काम सालभर से जारी है। वहीं डिवाइडर किनारे धूल साफ करने की रोड स्वीपिंग मशीनें खुद धूल फांक रही हैं।होम इंडस्ट्री, स्क्रैप व जुगाड़ वाहनों की समस्याशहर के औद्योगिक क्षेत्रों में भी चिमनियों और जनरेटरों के धुंए पर किसी प्रकार की लगाम नहीं है। खासतौर पर शहर की कालोनियों में घर-घर में चल रही अवैध फैक्ट्रियों के कारण शहर के अंदर की आबोहवा दूषित हो रही है। इसके अलावा लाख पाबंदी के बावजूद सड़क पर चलने वाले स्क्रैप और जुगाड़ वाहनों का धुआं लोगों का दम घोटने के लेवल पर पहुंच गया है।प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारणऔद्योगिक क्षेत्रों की चिमनियों और जनरेटरों से निकलने वाला धुआंसड़क पर चलने वाले जुगाड़ वाहनों का धुआंनिर्माण कार्यों में देरीग्रीन बेल्ट को विकसित करने में लापरवाहीकूड़ा जलने से निकलने वाला धुंआहर दिन निकलने वाला प्लास्टिक, रबर और अन्य तरह का कैमिकलकचरे के निस्तारण की व्यवस्था न हो पानाडोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन की व्यवस्था सही न होनाखुले में रखी निर्माण सामग्रीग्रेप के नियमानुसार प्रदूषण नियंत्रण के सभी संभव प्रयास किए जा रहे हैं। अन्य विभागों को भी अपने स्तर पर सहयोग के लिए कहा जा चुका है।राजेंद्र प्रसाद, क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारीबजट के अनुसार सभी जरूरी प्रयास जारी है। रोजाना शाम के समय हॉट स्पॉट पर वाटर स्प्रिंकल मशीन से पानी का छिड़काव किया जाता है। वेस्ट मैनेजमेंट, रोड डस्ट पर लगातार काम हो रहा है।सौरभ गंगवार, नगरायुक्त
Source: Dainik Jagran December 22, 2025 00:16 UTC