Anganwadi News: आंगनवाड़ी और मिड दे मील कर्मियों का संघर्ष, सम्मान और वेतन के लिए देश भर में आवाज - News Summed Up

Anganwadi News: आंगनवाड़ी और मिड दे मील कर्मियों का संघर्ष, सम्मान और वेतन के लिए देश भर में आवाज


Anganwadi News: आंगनवाड़ी और मिड दे मील कर्मियों का संघर्ष, सम्मान और वेतन के लिए देश भर में आवाज🔊 इसको सुने़जो महिलाएं दूसरों या कह सकते हैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के बच्चों की देखभाल करती हैं गर्भवती महिलाओं और माताओं के स्वास्थ्य के लिए दिन-रात काम करती हैं क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की है कि उनका अपना जीवन कैसा है? आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का नाम सुनते ही यह लगता है कि वे कोई सरकारी काम कर रही हैं इसलिए उनकी ज़िंदगी सुरक्षित और बेहतर होगी। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। बेहद कम मानदेय, कोई स्थायी नौकरी नहीं, सामाजिक सुरक्षा का अभाव और लगातार बढ़ता काम का बोझ यही उनकी रोज़मर्रा की सच्चाई है।भारत में बच्चों और महिलाओं की स्थिति सुधारने के मकसद से साल 1975 में एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) की शुरुआत की गई। उस समय देश में कुपोषण, शिशु और मातृ मृत्यु, गरीबी, बाल विवाह, बाल श्रम और शिक्षा की कमी जैसी गंभीर समस्याएं आम थीं। खासकर गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों तक सही पोषण और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पा रही थीं। इन हालात को देखते हुए आईसीडीएस लाई गई ताकि गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य की जानकारी दी जा सके और बच्चों को छह साल की उम्र तक जरूरी आहार और देखभाल मिल सके। यह योजना सिर्फ बच्चों के खाने और इलाज तक सीमित नहीं है बल्कि माताओं के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देती है ताकि वे स्वस्थ रहें और अपने बच्चों की बेहतर परवरिश कर सकें।भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है जहां बड़ी संख्या में लोग आज भी गहरी गरीबी में जी रहे हैं। कई परिवार ऐसे हैं जिनके बच्चों को भरपेट खाना तक नसीब नहीं होता। ऐसे हालात में बच्चों का बचपन अक्सर अभावों में गुजरता है। उन्हें न तो सही पोषण मिल पाता है और न ही समय पर टीकाकरण हो पाता है। इन्हीं समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने आईसीडीएस कार्यक्रम को लागू किया जो महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को बेहतर बनाने की सीधी पहल है। आंगनवाड़ी के ज़रिए बच्चों और महिलाओं को अतिरिक्त पोषण दिया जाता है ताकि उनके शरीर को ज़रूरी कैलोरी मिल सके। गरीबी और कुपोषण के कारण कई बच्चे पढ़ाई छोड़कर काम करने को मजबूर हो जाते हैं। आईसीडीएस योजना का उद्देश्य ऐसे बच्चों और महिलाओं तक स्वास्थ्य, पोषण और शुरुआती शिक्षा की सुविधाएं पहुंचाना है। इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं जिन पर इन सेवाओं को ज़मीन तक पहुंचाने की अहम जिम्मेदारी होती है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती।उनकी स्थितिजो महिलाएं दूसरों या कह सकते हैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के बच्चों की देखभाल करती हैं गर्भवती महिलाओं और माताओं के स्वास्थ्य के लिए दिन-रात काम करती हैं क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की है कि उनका अपना जीवन कैसा है? आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का नाम सुनते ही यह लगता है कि वे कोई सरकारी काम कर रही हैं इसलिए उनकी ज़िंदगी सुरक्षित और बेहतर होगी। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। बेहद कम मानदेय, कोई स्थायी नौकरी नहीं, सामाजिक सुरक्षा का अभाव और लगातार बढ़ता काम का बोझ यही उनकी रोज़मर्रा की सच्चाई है।अपने और अपने परिवार के लिए एक सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन की मांग को लेकर आज आंगनवाड़ी कार्यकर्ता देश के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर उतर रही हैं। बीते दो महीनों की बात करें तो ओडिशा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, कोलकाता सहित कई राज्यों में उनके आंदोलन देखने को मिले हैं। कहीं धरना है, कहीं रैली, तो कहीं अनिश्चितकालीन हड़ताल लेकिन उनकी ये आवाज़ें अक्सर खबरों में जगह नहीं बना पातीं। कुछ आंदोलन सुर्खियों में आ जाते हैं जबकि कई शहरों और कस्बों में उठी आवाज़ें वहीं दब कर रह जाती हैं। यह आंदोलन किसी बड़ी मांग के लिए नहीं हैं बल्कि सिर्फ जीने लायक वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान के लिए हैं। जो महिलाएं समाज की नींव को मज़बूत करती हैं वे खुद सबसे असुरक्षित हालात में काम करने को मजबूर हैं। सवाल यह नहीं है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता क्या चाहती हैं बल्कि यह है कि जो महिलाएं देश के बच्चों और माताओं के भविष्य की ज़िम्मेदारी उठाती हैं उन्हें अब तक उनका हक क्यों नहीं मिला। वैसे आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के अलावा आशा और मध्यान भोजन के रसोईयों का भी स्थिति बहुत अलग नहीं है।अलग अलग जगहों पर आंदोलन– 20 जनवरी 2026 को रीवाड़ी में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने मानदेय बढ़ोतरी और काम से जुड़े दबावों के खिलाफ प्रदर्शन किया। उन्होंने सरकार पर वादा निभाने में नाकाम रहने का आरोप लगाया। पोषण ट्रैकर और पोषण मीनू को लेकर भी सवाल उठाए गए। मांगें न माने जाने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी गई।– बुलंदशहर में 13 जनवरी 2026 को आंगनवाड़ी मित्री और सहायिकाओं ने लंबित मांगों को लेकर अधिकार सम्मेलन और धरना-प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और अतिरिक्त मानदेय की मांग उठाई। संगठन ने चेतावनी दी कि 31 जनवरी तक फैसला नहीं हुआ तो फरवरी से पूरे यूपी में ‘काम बंद–कलम बंद आंदोलन’ शुरू किया जाएगा।– 25 नवंबर 2025 को भुवनेश्वर में हजारों आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने वेतन बढ़ोतरी और सरकारी कर्मचारी का दर्जा मांगते हुए प्रदर्शन किया। यह विरोध विधानसभा के शीतकालीन सत्र से पहले किया गया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने पहले दिए गए आश्वासन पूरे नहीं किए। मांगें न मानी गईं तो अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी दी गई है।– 21 जनवरी 2026 को कोलकाता में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं समेत करीब 6,000 प्रदर्शनकारियों ने एस्प्लेनेड और आसपास के इलाकों में सड़क जाम कर दिया। एसएन बनर्जी रोड और डोरिना क्रॉसिंग पर धरने के कारण करीब छह घंटे तक यातायात पूरी तरह ठप रहा, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी।– कर्नाटक में बीते 1 दिसंबर 2025 से लाखों आंगनवाड़ी, मिड-डे मील और आशा कार्यकर्ता केंद्रीय सरकार के समक्ष अपनी मांगें रखकर अनिश्चितकालीन ह


Source: NDTV January 26, 2026 15:53 UTC



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