देहरादून, ब्यूरो: उत्तराखंड को अक्सर पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों के लिए जाना जाता है। यहां की प्रकृति जितनी खूबसूरत है, उतनी ही चिंताजनक एक सच्चाई भी है वो है गिद्धों की तेजी से घटती संख्या। कभी उत्तराखंड के आसमान में गिद्ध आम नजर आते थे, लेकिन अब उनकी मौजूदगी बहुत कम रह गई है। साल 2023 से 2025 के बीच भारत में पहली बार गिद्धों की स्थिति जानने के लिए एक बड़ा सर्वे किया गया। यह सर्वे डब्ल्यूआईआई की ओर से किया गया, जिसमें खास तौर पर 4 क्रिटिकली एंडेंजर्ड वल्चर के स्पीसीज पर फोकस रहा। इस पैन-इंडिया वल्चर पॉपुलेशन असेसमेंट से साफ हुआ कि गिद्ध सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश में खतरे में हैं। इस सर्वे में गिद्धों की गिनती से ज्यादा उनके घोंसलों और प्रजनन पर ध्यान दिया गया जिससे यह समझा जा सके कि हकीकत में कितने गिद्ध सुरक्षित तरीके से अपनी आबादी को आगे बढ़ा पा रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि अब उत्तराखंड में गिद्धों का भविष्य पूरी तरह संरक्षण प्रयासों पर निर्भर करता है।पैन-इंडिया सर्वेभारत में पहली बार गिद्धों को लेकर इतना बड़ा पैन-इंडिया सर्वे किया गया। इसका मकसद यह समझना था कि देश में गिद्धों की प्रजनन आबादी असल में कितनी बची है। इस सर्वे की सबसे खास बात इसका तरीका था। आमतौर पर गिद्धों की गिनती आसमान में उड़ते हुए पक्षियों को देखकर की जाती है, लेकिन गिद्ध बहुत दूर तक उड़ते हैं, जिससे सही पॉपुलेशन पता नहीं चल पाती। इस बार वैज्ञानिकों ने उड़ते गिद्धों को नहीं, बल्कि उनके घोंसलों को गिना। घोंसलों से यह साफ पता चलता है कि कितने गिद्ध वास्तव में अंडे दे रहे हैं और अपनी संख्या बढ़ा रहे हैं। इस सर्वे में खास तौर पर चार बेहद संकटग्रस्त गिद्ध प्रजातियों पर ध्यान दिया गया।पहाड़ों में बचे गिद्धपैन-इंडिया सर्वे में उत्तराखंड उन 17 राज्यों में शामिल रहा, जहां गिद्धों के घोंसले मिले हैं। लेकिन हकीकत यह है कि पहाड़ों में गिद्ध अब बहुत कम रह गए हैं। उत्तराखंड में ज्यादातर हिमालयन ग्रिफन गिद्ध पाए गए हैं। ये गिद्ध ऊंचे पहाड़ों, चट्टानों और मुश्किल इलाकों में घोंसला बनाते हैं। सर्वे में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर को मिलाकर हिमालयन ग्रिफन के 35 घोंसले मिले, जिनमें से 34 सक्रिय थे। उत्तराखंड में घोंसलों की संख्या कम रही, लेकिन कई ऊंचे और बर्फीले इलाकों तक पहुंचना मुश्किल है। इसलिए ये भी बताया गया की सर्वे में हो सकता है कि कुछ गिद्ध और उनके घोंसले अब भी हमारी नजर से दूर हों।व्हाइट-रम्प्ड और इंडियन गिद्ध की हालतएक समय था जब व्हाइट-रम्प्ड और इंडियन गिद्ध उत्तराखंड के निचले इलाकों और तराई क्षेत्रों में देखे जाते थे। लेकिन इस सर्वे में इन प्रजातियों के सक्रिय घोंसलों के बहुत कम प्रमाण मिले। इसका मतलब यह है कि उत्तराखंड अब इन प्रजातियों के लिए कोई बड़ा प्रजनन क्षेत्र नहीं रहा। देश के ज़्यादातर इंडियन गिद्ध अब मध्य प्रदेश और राजस्थान के टाइगर रिजर्व और संरक्षित क्षेत्रों तक सिमट चुके हैं।कार्कस डंप साइट्स और उत्तराखंडइस सर्वे में देशभर में मृत पशुओं के डंपिंग स्थलों का भी अध्ययन किया गया। राजस्थान जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में प्रवासी गिद्ध इन जगहों पर देखे गए।उत्तराखंड में ऐसी व्यवस्थित और सुरक्षित कार्कस डंप साइट्स की संख्या बहुत कम है। इसका नतीजा यह होता है कि गिद्धों को पर्याप्त खाना नहीं मिलता है। अगर उत्तराखंड में वैज्ञानिक तरीके से, गिद्ध-सुरक्षित डंप साइट्स विकसित की जाएं, तो यह राज्य के लिए एक बड़ा बदलाव ला सकता है।गिद्ध क्यों हैं जरूरीगिद्धों को लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन सच यह है कि वे नेचर के सबसे जरूरी सफाईकर्मी हैं। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां जंगल, गांव और जानवर एक-दूसरे के बहुत पास रहते हैं, गिद्धों की भूमिका और भी अहम हो जाती है। जब कोई जानवर मर जाता है और उसका शव खुले में पड़ा रहता है, तो उससे खतरनाक बीमारियां फैल सकती हैं। गिद्ध इन शवों को जल्दी खाकर साफ कर देते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा कम हो जाता है। अगर गिद्ध कम होंगे, तो सड़ते शव बढ़ेंगे, बीमारियां फैलेंगी, आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ेगी और इंसानों की सेहत पर सीधा असर पड़ेगा। इसलिए गिद्ध सिर्फ पक्षी नहीं, हमारी सेहत के रक्षक भी हैं।इनपर हुआ सर्वे1. इंडियन गिद्ध-10 राज्यों के 110 स्थानों पर मिले-कुल 1379 घोंसले, जिनमें 1029 सक्रिय-अनुमानित संख्या: 2058 से 2758 प्रजनन वयस्क-सबसे ज्यादा गिद्ध मध्य प्रदेश में पाए गए-खासकर पन्ना, सतपुड़ा और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में2. व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध-12 राज्यों में फैले हुए-कुल 945 घोंसले, जिनमें 890 सक्रिय-अनुमानित संख्या: 1780 से 1890 प्रजनन वयस्क-सबसे ज्यादा घोंसले हिमाचल प्रदेश के चीर पाइन जंगलों में मिले3. स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध:-सिर्फ असम के ऊपरी इलाकों में-केवल 20 घोंसले, मतलब सिर्फ 40 प्रजनन गिद्ध4. रेड-हेडेड गिद्ध:-बहुत अकेले रहने वाला गिद्ध-कुछ ही नेशनल पार्क में मिला-अनुमानित संख्या: सिर्फ 80 प्रजनन वयस्कक्यों गायब हो रहे हैं गिद्ध-पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जहरीली दवाएं-आज भी कुछ इलाकों में गिद्धों के लिए जहरीली दवाओं का खतरा बना हुआ है-मृत पशुओं के निस्तारण की सही व्यवस्था न होना-जंगलों और पुराने पेड़ों की कटाई-सड़क, बिजली और पर्यटन से बढ़ता इंसानी दबाव-सुरक्षित भोजन की कमी होनाचिंता की बात-गिद्ध अपने 70% पुराने घोंसला स्थलों से गायब हो चुके हैं-अब ज़्यादातर गिद्ध सिर्फ प्रोटेक्टेड एरिया में ही बचे हैं-इससे साफ है कि खुले इलाकों में गिद्ध सुरक्षित नहीं हैं-भारत में गिद्ध अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी हालत बहुत नाज़ुक है।-अगर अभी सही कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में कई प्रजातियां हमेशा के लिए गायब हो सकती हैं।-लगातार निगरानी, सुरक्षित दवाइयां, और जंगलों की रक्षा ही गिद्धों को बचा सकती है।-अगर गिद्ध खत्म हुए तो बीमारियाँ बढ़ेंगी और पर्यावरण को नुकसान होगा
Source: Dainik Jagran December 30, 2025 16:08 UTC