दिनेश कुकरेती, जागरण देहरादून। Jagran Forum विश्वभर में आज जेन-जी की बात हो रही है। कहा जा रहा कि वह व्यापक स्तर पर बदलाव चाहता है। उसमें व्यवस्थाओं को लेकर व्याकुलता है। वह उन शासकों को चुनौती देने के लिए आतुर है, जो मानते हैं कि धरती, वायु, जल व नक्षत्रों पर सिर्फ उन्हीं का अधिकार है। ऐसा नेपाल समेत कई देशों में देखने को मिला।हालांकि, वहां नेतृत्व के अभाव के चलते जेन-जी वह सब कर गुजर गया, जो उसे नहीं करना चाहिए था। इसलिए भारतीय परिदृश्य में जेन-जी या यूं कहें कि तरुण-तरुणियों की भूमिका को परिभाषित करने के लिए हमें व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा, क्योंकि जेन-जी का वास्तविक धर्म सिर्फ भारत का युवा ही जानता है।वह अपने पुरुषार्थ से दुनिया में बदलाव भी ला रहा है और जिस तरह अपने आचार-व्यवहार से वह समाज में बदलाव लाने को अग्रसर है, उससे यह उम्मीद बलवती होती है कि भविष्य में वही समाज को नई दिशा देगा। जिस दिन भारत पूरी तरह विकसित हो जाएगा, उस दिन संपूर्ण विश्व की व्याकुलता भी चली जाएगी।जागरण फोरम में ‘जेन-जी का धर्म’ विषय पर आयोजित चौथे सत्र को संबोधित करते हुए जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत में जेन-जी के एक वर्ग के पास धर्म, अध्यात्म और विज्ञान की समझ है। वह नवाचार करना जानता है और प्रभुत्व को चुनौती देते हुए सुरक्षा, संपन्नता व अभिव्यक्ति के पक्ष में खड़ा है। वह अपने धर्म से कभी विमुक्त नहीं हो सकता। वह जानता है कि जैसा बर्ताव स्वयं को पसंद नहीं, वैसा दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए।बड़ी बात तो यह है कि वह डिजिटल डिटाक्स की ओर बढ़ रहा है। वह नवाचार, आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा, व्यक्तित्व विकास और समाज की उन्नति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भली-भांति समझता है। स्वामी अवधेशानंद कहते हैं, हालांकि यह बात अभी जेन-जी के बड़े वर्ग को समझनी है, जिसे यह तक नहीं मालूम कि संस्कार, विचार और मूल्य क्या हैं। अभी भी पूंजी, सफलता व प्रगति का भूत उस पर सवार है। प्रतिष्ठा की ललक उसे कुछ सोचने नहीं दे रही।संस्कृति और संस्कारों की बात उसे बचकानी लगती है। यही हमारी सबसे बड़ी चिंता है, जिसे दूर करने को हमें नये सिरे से विचार करना होगा। हमें सभ्याचार, शिष्टाचार व सौम्याचार को अपनाना होगा। अपने बच्चों में समझ विकसित करनी होगी कि परंपराओं का जन्म कपोल-कल्पित विचारों से नहीं, वरन विज्ञान से हुआ है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि संस्कार हमें दकियानूस नहीं बनाते, बल्कि समृद्धि प्रदान करते हैं। हम तो यह तक भुला बैठे हैं कि हमारे सोलह संस्कार महज खानापूर्ति नहीं हैं, बल्कि इनमें व्यक्तित्व विकास और समाज की उन्नति की वैज्ञानिक अवधारणा छिपी हुई है।बच्चों को संस्कारों की जानकारी न देना, हमारी सबसे बड़ी भूल स्वामी अवधेशानंद कहते हैं कि बच्चों को संस्कारों की जानकारी न देना हमारी सबसे बड़ी भूल है। यही वजह है कि युवा पीढ़ी उन्मुक्तता के नाम पर कुछ भी कर गुजर रही है। विश्वविद्यालयों में खुलेपन की आड़ में जो-कुछ घट रहा है, वह संस्कृति और संस्कारों की जानकारी न होने का ही नतीजा है।युवा पीढ़ी को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए अतीत में झांकना जरूरी है। वह कहते हैं कि आज देश में ऐसी क्रांति की जरूरत है, जो हमें मानसिक तनाव से बाहर निकाल सके और ऐसा अध्यात्म में रमने से ही संभव हो पाएगा। यही आनंद की प्राप्ति यानी सत्य की राह है।जड़ों की ओर लौटने से ही बनेंगे हम आदर्श नागरिक जूना पीठाधीश्वर ने युवाओं का उपनिषदों की ओर लौटने का आह्वान करते हुए कहा कि हमें आदर्श नागरिक बनने के लिए प्राकृतिक जीवन शैली अपनानी होगी और जड़ों की ओर लौटना होगा। हमें सूर्य और चंद्रमा की गति के साथ चलना सीखना होगा।कितने आश्चर्य की बात है कि पश्चिम भारतीय जीवन शैली को अपना रहा है और हम पश्चिम की विकृतियों को आत्मसात कर रहे हैं। हालांकि, यह भी सत्य है कि भविष्य की पीढ़ी को भारतीयता की ओर लौटाने में जेन-जी की बड़ी भूमिका रहने वाली है।मैकाले ने विकसित की नौकरियों के पीछे भागने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में जो विसंगतियां देखने को मिलती हैं, उसके लिए मैकाले की शिक्षा पद्धति ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। भारतीय लोग उद्यमी प्रवृत्ति के रहे हैं, लेकिन मैकाले ने उनमें नौकरियों के पीछे भागने की ऐसी प्रवृत्ति विकसित कर दी, जिससे हमारा पूरा सामाजिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो गया।नतीजा हम उद्यम से दूर होते चले गए। आचार्य ने युवाओं का आह्वान किया कि वह न केवल जड़ों और उद्यमिता की ओर लौटें, बल्कि भारतीयता के साथ जीने का भी संकल्प लें। जीवन जीने की यह पद्धति कम खर्चीली ही नहीं, स्वाभाविक और प्रकृति से जुड़ी हुई भी है।हम दीप जलाने की परंपरा के लोग आचार्य महामंडलेश्वर ने कहा कि भारतीय दीप जलाने की परंपरा के लोग हैं, जबकि पश्चिम का अंधानुकरण कर दीप बुझाने की परंपरा को आत्मसात कर बैठे हैं। यह स्वच्छंदता हमें कहां ले जा रही है, इस पर विचार करना होगा।याद रहे कि अंत:करण से भारतीय बनकर ही हम प्रकाश की ओर लौट पाएंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो प्रकाश का अनुगामी रहा है, वही भारत है। बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकते हिंसा के विचार स्वामी अवधेशानंद कहते हैं कि भारतीय चिंतन परंपरा में स्वयं के प्रति गौरव व सम्मान का भाव छिपा हुआ है। हम उस परंपरा के लोग हैं, जहां ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ और ‘लोका: समस्ता: सुखिनो भवंतु’ की बात होती है।हमारी सोच है कि धरती के सभी प्राणी एक हैं। जिस दिन हम पूरे मनोयोग से इस सोच को लेकर आगे बढ़ने लगेंगे, उस दिन सारी दुनिया यहीं आ जाएगी। ध्यान रहे कि हिंसा के विचार बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकते, इसीलिए आज पूरी दुनिया भारतीय योग परंपरा की ओर उन्मुख हो रही है।पश्चिम में तो अब एक ऐसा वर्ग भी विकसित हो गया है, जो स्वयं को वीगन कहता है। यानी वह किसी भी तरह के पशु जनित उत्पाद का ग्रहण नहीं करता, फिर चाहे वह दूध ही क्यों न हो। इसस
Source: Dainik Jagran January 17, 2026 20:08 UTC