Kanpur News : राजापुरवा के आंगनवाड़ी केंद्र की हालत किसी जर्जर खंडहर से कम नहीं - News Summed Up

Kanpur News : राजापुरवा के आंगनवाड़ी केंद्र की हालत किसी जर्जर खंडहर से कम नहीं


कानपुर (ब्यूरो)। शहर के राजापुरवा इलाके में बना आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा प्रशासनिक लापरवाही की कहानी बयान कर रहा है। बाहर से देखने पर यह बिल्डिंग पूरी तरह खंडहर जैसी दिखाई देती है, लेकिन अंदर डेली मासूमों की किलकारियां गूंजती हैं। एक रीडर की कंप्लेन पर थर्सडे को दैनिक जागरण आईनेक्स्ट के रिपोर्टर ने मौके पर पहुंचकर हालात देखे। इस दौरान बिल्डिंग की हालत बेहद ही चिंताजनक मिली। बिल्डिंग की जर्जर छत के नीचे बच्चे खेलते नजर आए, जबकि एक कमरे में आंगनवाड़ी स्टाफ मौजूद था। बताया गया कि बच्चे कुछ देर पहले ही घर लौटे हैं, लेकिन रोज यहां 30 से 40 बच्चों की मौजूदगी रहती है।गिरता प्लास्टर बना खतरे की घंटीबिल्डिंग की छत कई जगह से उखड़ चुकी है और प्लास्टर लगातार गिर रहा है। कमरे के कोनों में गिरे मलबे के निशान साफ दिखाई देते हैं। बीम में दरारें पड़ चुकी हैं और अंदर की सरिया बाहर झांकने लगी है, जो किसी भी वक्त गंभीर हादसे का कारण बन सकती है। बच्चों के बैठने और खेलने की जगह के ठीक ऊपर यह खतरा हर समय मंडराता रहता है।तार से बंधी खिड़कियां, टूटे दरवाजेकेंद्र की खिड़कियां इतनी जर्जर हो चुकी हैं कि उन्हें गिरने से बचाने के लिए तार से बांधकर रखा गया है। दरवाजों की हालत भी खराब है और कई हिस्सों में दीवारों की ईंटें तक उखड़ चुकी हैं। बरसात और आंधी के समय यहां बैठना और भी खतरनाक हो जाता है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई फिर भी जारी रहती है।सालों से कई से शिकायत, नहीं हुई सुनवाईसेंटर की महिला स्टाफ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भवन की खराब हालत को लेकर कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और डूडा विभाग से शिकायत की जा चुकी है। बार-बार अनुरोध के बावजूद अब तक मरम्मत या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। स्टाफ और पेरेंट्स दोनों ही बच्चों की सुरक्षा को लेकर परेशान हैं।सामुदायिक केंद्र से बना आंगनवाड़ीयह बिल्डिंग साल 1994 में डूडा विभाग द्वारा सामुदायिक केंद्र के रूप में बनाया गया था। जर्जर होने के बाद स्थानीय लोगों ने इसका यूज बंद कर दिया, लेकिन बाद में यहां आंगनवाड़ी और वैक्सीनेशन सेंटर शुरू कर दिया गया। अब इसी खंडहर में बच्चों की पढ़ाई और टीकाकरण दोनों चल रहे हैं।रोज आते हैं 30 से 40 बच्चेकेंद्र से जुड़े करीब 100 बच्चे हैं, जिनमें से रोज 30 से 40 बच्चे पढ़ने आते हैं। पेरेंट्स का कहना है कि उन्हें मजबूरी में बच्चों को यहां भेजना पड़ता है क्योंकि आसपास कोई वैकल्पिक केंद्र नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की यह लापरवाही किसी बड़े हादसे को न्योता दे रही है। समय रहते भवन की मरम्मत या बच्चों के लिए सुरक्षित जगह की व्यवस्था नहीं की गई तो कभी भी बड़ा नुकसान हो सकता है।


Source: Dainik Jagran February 27, 2026 23:25 UTC



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