साल 2004-05 में एक सामाजिक संस्था 'दूसरा दशक परियोजना' के कार्यकर्ता गांव पहुंचे और उन्होंने कांता को आबूरोड में आयोजित चार माह के आवासीय शिविर में पढ़ाई के लिए शामिल कराया. उनकी मां ने बेटी की पढ़ाई के लिए अपने गहने गिरवी रख दिए और घर का अनाज तक बेच दिया. कांता बताती हैं कि आज भी उनके गांव में वे सबसे अधिक शिक्षित हैं और उन्होंने एमए तथा बीएड तक की पढ़ाई पूरी की है. गांव के लोग कहते थे कि आज तक किसी लड़की ने पढ़ाई नहीं की, कांता पढ़कर क्या कर लेगी. यह कहानी केवल कांता कुमारी की ही नहीं है, बल्कि सिरोही जिले के आबूरोड और पिंडवाड़ा क्षेत्र की कई आदिवासी बेटियों की है, जिन्होंने पुलिस सेवा में स्थान हासिल कर समाज में नई मिसाल पेश की है.
Source: NDTV March 08, 2026 09:40 UTC