व्यापारिक नजरिये से यह स्टार्टअप एक बड़ी सफलता साबित हुआ है। वित्त वर्ष 2024-25 में इस वेंचर ने ₹1 करोड़ का टर्नओवर हासिल किया है। इसका टारगेट 2030 तक इसे ₹10 करोड़ तक पहुंचाना है। 1,000 किसानों के साथ शुरू हुआ यह सफर अब 3,000 किसानों को जोड़ने की ओर अग्रसर है। अपनी मेहनत और नवाचार के लिए जेना दंपति को कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, जो यह साबित करता है कि सही सोच और तकनीक से कचरा भी बेशकीमती हो सकता है।इस पहल ने स्थानीय किसानों की किस्मत बदल दी है। अब किसानों को अपने खेत साफ करने के लिए खर्च नहीं करना पड़ता, बल्कि उन्हें प्रति पेड़ 10 रुपये की अतिरिक्त आय भी हो रही है। व्हाट्सएप ग्रुप के जरिये वेस्ट कलेक्शन की एक मजबूत सप्लाई चेन बनाई गई है, जहां किसान सूचना देते हैं और संस्था के वाहन खेत से खुद कचरा उठा लेते हैं। इस मॉडल से न केवल वायु प्रदूषण (जलाने से होने वाला) कम हुआ है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है।साल 2021 में इस दंपति ने अपनी स्टार्टअप फर्म शुरू की। आज वे हर महीने लगभग 300 टन केले के कचरे को प्रोसेस कर रहे हैं। उन्होंने तकनीक और इनोवेशन के मेल से 100 से अधिक उत्पाद तैयार किए हैं। इन्हें खाद्य, उपयोगिता और कृषि श्रेणियों में बांटा गया है। तने के सबसे भीतरी कोमल हिस्से से अचार, जूस और मुरब्बा बनाया जाता है, जबकि बाहरी परतों से रेशा निकालकर उससे 'बनाना सिल्क' जैसी चमक वाली हाथ की कलाकृतियां, बैग और मैट तैयार किए जाते हैं। जो अवशेष बच जाता है, उससे जैविक खाद और कीटनाशक बनाए जाते हैं। इससे यह पूरी तरह 'जीरो-वेस्ट' मॉडल बन गया है।काशीनाथ जेना ने अपने गांव की यात्रा के दौरान देखा कि उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी के कारण केले की खेती तो भरपूर हो रही है। लेकिन, फसल कटाई के बाद किसान उसके भारी-भरकम तनों के निपटान से परेशान हैं। केले का पौधा केवल एक बार फल देता है। इसके बाद उसका तना किसानों के लिए सिरदर्द बन जाता था क्योंकि इसे साफ करने के लिए उन्हें मजदूरों को पैसे देने पड़ते थे। काशीनाथ ने इस चुनौती को अवसर में बदलने की ठानी और विभिन्न राज्यों का दौरा कर केले के रेशे (फाइबर) और उसके खाद्य उपयोगों का गहन अध्ययन किया।
Source: Navbharat Times January 11, 2026 01:53 UTC