राजेंद्र कुमार साहू की खेती 'जीरो वेस्ट' मॉडल पर आधारित है। मशरूम उत्पादन के बाद बची हुई पराली को वे फेंकते नहीं है। इसके बजाय वेस्ट डीकंपोजर की मदद से जैविक खाद में बदल देते हैं। इसे वह अपने खेतों में इस्तेमाल करते हैं या अन्य किसानों को मुफ्त में बांट देते हैं। वह अब तक हजारों लोगों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दे चुके हैं। उनकी इस इनोवेटिव सोच के लिए उन्हें 2019 में राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है, जो साबित करता है कि अगर सही सोच और तकनीक हो तो खेती से भी शानदार आजीविका कमाई जा सकती है।वर्तमान में राजेंद्र के पास 2,000 मशरूम बेड की क्षमता है और वह रोजाना लगभग 50 किलो मशरूम का उत्पादन करते हैं। पैडी स्ट्रॉ मशरूम अपने बेहतरीन स्वाद और फ्लेवर के लिए मशहूर है। बाजार में यह 270 से 300 रुपये प्रति किलो तक बिकता है। एक बेड को तैयार करने की लागत मात्र 70-80 रुपये आती है। इससे उन्हें हर दिन करीब 10,000 रुपये का मुनाफा होता है। सर्दियों के महीनों में वह ऑयस्टर मशरूम की खेती की ओर रुख कर लेते हैं। इससे साल भर उनकी कमाई जारी रहती है।राजेंद्र ने मशरूम उगाने के लिए महंगे शेड बनाने के बजाय प्रकृति का सहारा लिया। उन्होंने अपने गांव में आम के पेड़ लगाए और उनकी छाया के नीचे वर्टिकल स्टैंड पर मशरूम बेड तैयार किए। पेड़ों की छाया न केवल तापमान को खुले क्षेत्र के मुकाबले 10 डिग्री कम रखती है, बल्कि नमी को भी प्राकृतिक रूप से बनाए रखती है। इस 'माइक्रो-क्लाइमेट' की वजह से वह मार्च से अक्टूबर तक यानी भीषण गर्मी में भी मशरूम का सफल उत्पादन कर पाते हैं।बहुत पढ़े-लिखे होने के बावजूद राजेंद्र कुमार साहू ने खेती को ही अपना करियर चुना। साल 2005 में ऑयस्टर मशरूम से शुरुआत करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि स्थानीय बाजार में पैडी स्ट्रॉ मशरूम (जिसे स्थानीय भाषा में 'पारा' कहा जाता है) की मांग और कीमत दोनों ज्यादा हैं। उन्होंने ओडिशा से बीज (स्पॉन) लाकर प्रयोग शुरू किए। धीरे-धीरे इसमें महारत हासिल की। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि खुद घर पर कम लागत वाले उपकरणों, जैसे प्रेशर कुकर और स्पिरिट लैंप की मदद से उच्च गुणवत्ता वाले 'स्पॉन' तैयार करना रही। इससे उनकी निर्भरता बाहरी स्रोतों पर खत्म हो गई।
Source: Navbharat Times January 06, 2026 07:19 UTC