कौन थे कुमार भास्कर वर्मा? जिनके नाम पर ब्रह्मपुत्र नदी पर बना पुल, पीएम मोदी ने किया है उद्घाटनKumar Bhaskar Varma Bridge : पीएम नरेंद्र मोदी ने आज असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने कुमार भास्कर वर्मा सेतु का उद्घाटन किया है। यह सेतु गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी का सफर आसान करेगा।ब्रह्मपुत्र नदी पर बना पुल और पीएम मोदी और असम सीएम के हाथों में कुमार भास्कर वर्मा की तस्वीर।Follow UsFollow Us:Who was Kumar Bhaskar Varma : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम को 5450 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं की सौगात दी है। इसमें सबसे खास गुवाहाटी में बना 3000 करोड़ रुपये का कुमार भास्कर वर्मा सेतु है। ब्रह्मपुत्र नदी पर बना यह छह लेन का विशाल पुल न केवल गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी की दूरी मिटाएगा, बल्कि असम के आर्थिक विकास को नई गति भी देगा। मगर, क्या आप जानते हैं कि आधुनिक इंजीनियरिंग के इस अद्भुत नमूने का नाम जिस कुमार भास्कर वर्मा के नाम पर रखा गया है, उनका भारतीय इतिहास में क्या महत्व है? भास्कर वर्मन, जिन्हें इतिहास में कुमार राजा के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन असम यानी कामरूप के वर्मन वंश के सबसे प्रतापी और शक्तिशाली सम्राट थे। 600 से 650 ईस्वी तक यानी पूरे 50 वर्षों तक उन्होंने शासन किया। उनकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर थी, जो अब के आधुनिक गुवाहाटी के पास स्थित थी। वह वर्मन वंश के अंतिम, लेकिन सबसे महान शासक साबित हुए।विपदाओं के बीच उभरा एक महान योद्धाभास्कर वर्मा का सत्ता तक पहुंचने का सफर संघर्षों से भरा था। जब महासेन गुप्त ने कामरूप पर हमला किया तो उस युद्ध में भास्कर के पिता वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बड़े भाई सुप्रतिष्ठित वर्मन ने कुछ समय राज किया, लेकिन उनके असामयिक निधन के बाद करीब 600 ईस्वी में राज्य की बागडोर भास्कर वर्मा के हाथों में आई। उन्होंने न केवल अपने खोए हुए साम्राज्य को वापस जीता, बल्कि इसका विस्तार आधुनिक पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के सिलहट तक कर दिया।चीनी यात्री ह्वेन त्सांग और हर्षवर्धन से मित्रतासम्राट भास्कर वर्मा की ख्याति केवल युद्धों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे ज्ञान और विद्वानों के संरक्षक भी थे। सुप्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग उनके निमंत्रण पर कामरूप आए थे और वहां एक महीने तक उनके राजकीय अतिथि बनकर रहे। भास्कर वर्मा की मित्रता उत्तर भारत के शक्तिशाली सम्राट हर्षवर्धन से भी थी। ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार भास्कर वर्मा ने ह्वेन त्सांग को 20000 हाथियों और 30000 नावों के लाव-लश्कर के साथ राजा हर्ष के पास गंगा तट तक पहुंचाया था, जो उनकी सैन्य शक्ति और वैभव का प्रतीक था।यह भी पढ़ें : असम में पीएम मोदी का दौरा, मोरान बाईपास पर उतरेगा विमान, ₹5,450 करोड़ की योजनाओं की देंगे सौगातभारत की ‘अभेद्य दीवार’सम्राट भास्कर वर्मा को भारत की ‘पूर्वी दीवार’ कहा जाता है। जब तक वे सत्ता में रहे, उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की सीमाओं को विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षित रखा। नालंदा की खुदाई में मिली उनके साम्राज्य की मुहरें आज भी उनकी ऐतिहासिक महानता की गवाही देती हैं। हालांकि उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था, जिससे उनके बाद वर्मन वंश कमजोर पड़ गया, लेकिन उनकी वीरता की गाथा आज भी असम की मिट्टी में रची-बसी है। आज इस नए सेतु का उनके नाम पर होना, उसी महान गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने की एक कोशिश है।
Source: Dainik Bhaskar February 14, 2026 17:30 UTC