आचार्य लोकेशमुनिमनुष्य के जीवन में गैर-जिम्मेदारी एवं लापरवाही की बड़ी-बड़ी चट्टानें पड़ी हुई हैं, जो मनुष्य और मनुष्य के बीच में व्यवधान पैदा कर रही हैं। संकल्प, संयम एवं समर्पण के हाथ इतने मजबूत हैं कि उन चट्टानों को हटाकर आदमी को आदमी से मिला सकते हैं। ये हाथ जीवन की संभावनाओं को पंख लगा सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि आदमी में खुद पर विश्वास जगे।दुख की घटनाएं घटती हैं, उन्हें कोई रोक नहीं सकता। भूकंप आता है, तूफान आता है, उल्कापात होता है, समुद्री तूफान आता है, समुद्री बवंडर आता है- इन्हें कोई रोक नहीं सकता। कोरोना महामारी और प्राकृतिक प्रकोप की घटनाएं घटित होती हैं, उन्हें कोई रोक नहीं सकता। किंतु मनुष्य एक काम कर सकता है। वह इन अवश्यंभावी प्रकोपों से पैदा होने वाले दुखद संवेदनों से अपने आपको बचा सकता है। आम तौर पर ये घटनाएं हमारे मन और मस्तिष्क को बोझिल बना देती हैं। कई बार तो ये हमें जीते-जी मरने की स्थिति में ला देती हैं। मगर सही दिशा में किए गए थोड़े प्रयासों के जरिए इन प्रभावों से बचा जा सकता है।इसके लिए जरूरी है कि ध्यान, साधना एवं संयम का अभ्यास किया जाए। लगातार यह सोचते रहें, मन में दोहराते रहें कि मैं स्वस्थ हूं, मैं संतुलित हूं। समाधि का सूत्र है- ‘मैं दुःख भोगने के लिए नहीं जनमा हूं।’ ये बहुत ही महत्वपूर्ण है। इससे दुख के संवेदन समाप्त हो जाते हैं। संबंधों, संपर्कों और पदार्थों से होने वाले सारे दुख अपने-आप मिट जाते हैं। यही है अनासक्ति योग। अनासक्ति का अर्थ है- पदार्थ के साथ जुड़ी हुई चेतना का संपर्क कम हो जाना। जब यह होता है तब समूचे जीवन में चेतना व्याप्त हो जाती है और आसक्ति की छाया दूर हो जाती है।जीवन में शोक की भी प्रबलता है। आदमी प्रायः शोकग्रस्त देखा जाता है। एक शोक मिटता है, दूसरा उभर आता है। इन सारी स्थितियों का मूल कारण है- असंतुलन एवं असंयम। जैन दर्शन के संदर्भ में जीवन के उद्देश्य की सुंदर परिकल्पना यह है कि ज्ञान, दर्शन या चरित्र का समन्वित विकास हो। ज्ञान के साथ-साथ दर्शन का पूरा विकास हो और उसके साथ-साथ चरित्र का भी विकास हो। इनमें सिर्फ किसी एक का विकास व्यक्तित्व निर्माण का घटक नहीं हो सकता। उससे सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्मित नहीं हो सकता। तीनों के विकास से ही यह संभव है।जब व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पाता, तब हजारों समस्याएं पैदा होती चली जाती हैं। इनका कहीं अंत नहीं आता। गरीबी, रोजगार, जीवन निर्वाह की समस्याएं हों या मकान और कपड़े की समस्याएं हों या फिर अन्य तमाम समस्याएं हों, वे सारी की सारी गौण समस्याएं हैं, मूल समस्या नहीं है। ये पत्तों की समस्याएं हैं, जड़ की नहीं हैं। पत्तों का क्या? पतझड़ आता है, सारे पत्ते झड़ जाते हैं। वसंत आता है, सारे पत्ते आ जाते हैं, वृक्ष हरा-भरा हो जाता है। यह मूल समस्या नहीं है। मूल समस्या यह है कि व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पा रहा है। मिथ्या दृष्टिकोण, असंयम, प्रमाद, कषाय, चंचलता। जैन दर्शन ने बताया कि मूल समस्याएं ये पांच हैं। यही वास्तव में दुःख है। यही दुःख का चक्र हैं और यही कोरोना मुक्ति की भी बड़ी बाधाएं हैं। जब तक इस दुःख के चक्र को नहीं तोड़ा जाएगा तब तक जो कोरोना से जुड़ी सामाजिक, मानसिक और आर्थिक समस्याएं हैं, उनका सही समाधान नहीं हो पाएगा।
Source: Navbharat Times April 16, 2020 04:52 UTC