इसरो के प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. राजमल ने भास्कर से साझा की जलवायु अध्ययन से जुड़ी रिसर्च - News Summed Up

इसरो के प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. राजमल ने भास्कर से साझा की जलवायु अध्ययन से जुड़ी रिसर्च


प्रियंक भट्ट/प्रशांत जोशी| बांसवाड़ादेशभर में स्वाइन फ्लू से अब तक 1335 से भी ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। अकेले राजस्थान में ही बीते महीने में 83 लोगों को स्वाइन फ्लू की चपेट में आने से जान गंवानी पड़ी। इसमें कोई दो राय नहीं कि आने वाले सालों में फ्लू, हार्ट अटैक और फेफड़ों के रोग सरीखे भयानक बीमारियों का प्रकोप बढ़ेगा और इसकी वजह है सूर्य के घटते डार्क स्पॉट (सूर्य कलंक)। हम आपको डरा नहीं रहे बल्कि वैज्ञानिकों के ताजा रिसर्च के आधार पर सचेत कर रहे है। दरअसल, सूर्य पर डार्क स्पॉट(सूर्य कलंक) होते हैं जो हमारी धरती की जलवायु को प्रभावित करते रहते हैं। सूर्य के डार्क स्पॉट में लगातार कमी आ रही है। ये सूर्य कलंक वैसे प्रति 11 वर्ष में कम और अधिक होते रहते हैं, जिसे सूर्य कलंक चक्र कहा जता हे । लेकिन पिछले 40 वर्षों से सूर्य कलंकों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। जिससे वैज्ञानिक भी चिंतित है। सूर्य कलंकों की संख्या में कमी से पृथ्वी पर तापमान में बदलाव आता है और लगातार कमी की वजह से ठंड बढ़ती है। जिससे फ्लू, हार्ट अटैक और फेफड़ों के रोग सरीखे भयानक बीमारियां बढ़ती है। ये संभावना पिछले कई वर्षों से उदयपुर की सौर वैधशाला, इसरो अहमदाबाद और वर्तमान मे नासा, अमेरिका में सूर्य और पृथ्वी के संबंध और जलवायु पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिक डॉ. राजमल जैन ने जताई है। बांसवाड़ा दौरे पर आए जैन से भास्कर ने स्वाइन फ्लू के बढ़ते असर को लेकर चर्चा की तो उन्होंने जलवायु में लघु और दीर्घकालीन परिवर्तन पर यह खुलासा किया।इसरो वैज्ञानिक डॉ. राजमल जैनचित्र में दिख रहे हैं ये सूर्य के भीतर मैग्नेटिक उथल-पथल के कारण उत्पन्न होते है। इनके अंदर अत्यधिक चुंबकीय ऊर्जा के संचय के कारण उस पर विस्फोट होता है। जिससे जहरीली किरणें और अत्यधिक उच्च ऊर्जा के कण बाहर आते हैं जो हमारी धरती के वायुमंडल, जलवायु और इसके चुंबकीय ढाल को प्रदूषित करते हंै।इस सदी के मध्य से प्रारंभ होकर अगली सदी आरंभ तक ग्लोबल कूलिंग का युग आ सकता है। ऐसा नजारा अगली तीन पीढ़ियों को देखने को मिल सकता है। इसे माउंडर मिनमिन की स्थिति कहते है जिसमें ग्लोब कूलिंग बेहद बढ़ जाती है।वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि सन 1980 में सूर्य कलंकों की संख्या की तुलना में 1992 में सूर्य कलंक कम थे। 1992 की तुलना में 2002-2003 में और भी कम हो गए। इसके बाद 2014 में इनकी संख्या में बड़ी भारी कमी दर्ज की गई। विश्व के वैज्ञानिक ये अनुमान लगा रहे हैं कि 2025 में भी सूर्य कलंकों की संख्या कम रहेगी। जिसके फलस्वरूप लगभग सन 2045 के आसपास सूर्य कलंक फिर से नगण्य संख्या में हो जाएंगे।वर्ष 1645 से 1715 तक, लगभग 70 वर्षों की अवधि में सूर्य कलंक नगण्य संख्या में थे। इस काल को मौन्डर मिनिमम कहते हैं। इसी काल में ग्लोबल कूलिंग ( लिटिल आइस एज ) हुई थी, जिसके कारण कई बीमारियां पनपी थी। इसके असर से यूरोप, अमेरिका में बड़ी तादाद में लोगों की मौतें भी हुई थी। वैसा ही कुछ 400 साल बाद मौन्डर् मिनिमम फि‍र से आ रहा है। ये अनुमान इसलिए लग रह है क्योंकि पिछले 40 वर्षों से सूर्य के अंदर सूर्य कलंकों की संख्या में लगातार कमी आ रही है।सूर्य का असर जानने के लिए भारत 2021 में आदित्य लांच करेगाडॉ. जैन ने बताया कि वे पिछले दिनों अमेरिका के नासा गए थे, वहां भी वैज्ञानिकों में इसी मुद्दे को लेकर चर्चाएं चल रही है। सूर्य के अध्ययन के लिए अमेरिका के नासा ने पिछले वर्ष पार्कर प्रोब उपग्रह भेजा है। यूरोप सोलर ओरबिटर उपग्रह भेजने वाला है और भारत भी वर्ष 2021 में आदित्य उपग्रह लांच करने की तैयारी में है। स्वाइन फ्लू का वायरस भी पहले से मौजूद था, लेकिन तापमान में गिरावट या जलवायु में परिवर्तन पर ऐसे वायरस एक्टिव हो जाता हैं।


Source: Dainik Bhaskar February 05, 2019 21:00 UTC



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