इस काम के करने से यश, आयु और ऐशवर्य में होती है वृद्धि - News Summed Up

इस काम के करने से यश, आयु और ऐशवर्य में होती है वृद्धि


ब्रह्मा कुमारी शुक्लादुनिया में किसी का भी अस्तित्व सिर्फ अपने लिए नहीं होता। सागर या नदी का जल हमेशा दूसरों के लिए है। न तो नदी अपना पानी पीती है और न ही पेड़ अपने फल खाते हैं। शायद इसलिए पृथ्वी, पवन, पावक व सूर्य आदि को हिंदू संस्कृति में देवताओं का दर्जा दिया गया है। अगर हम ‘देने की प्रवृत्ति’ को एक संस्कार बना लें, तो अपने जीवन को देवी-देवताओं के तुल्य स्वस्थ, सुखी, संपन्न व समृद्ध बना सकते हैं। क्योंकि असली सुख देने में है, लेने में नहीं और देने में ही लेना समाया हुआ है। खुशी देने से खुशी बढ़ती है, दूसरों की भलाई करने से खुद की भलाई होती है तथा दान-पुण्य करने से यश के साथ आयु एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होती है।मुश्किल समय में इस तरह जीवन को बनाएं सार्थक, तभी मिलेगी मानसिक शांतियह सच है कि मनुष्य दुनिया की किसी भी चीज का स्वामी नहीं, सिर्फ उपयोग करने वाला है। स्वामित्व भाव रखने से उस चीज से आसक्ति, मोह, भय और चिंता होना स्वाभाविक है, जो दुख और अशांति का कारण हैं। वस्तु के प्रति केवल निमित्त या संरक्षक का भाव रखने से मनुष्य उसका पालक, पोषक व संरक्षक बनता है, विनाशक नहीं। क्योंकि जिस चीज को उसने बनाया ही नहीं, उसे नष्ट करने का भी उसे कोई अधिकार नहीं। कभी अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा या लालच के वश अगर उस चीज का उत्पीड़न, दोहन या दुरुपयोग करता भी है, तो वह कहीं न कहीं कुदरत से शापित या दंडित हो ही जाता है। जीवन, समाज और प्रकृति में संतुलन, समरसता व सुखशांति का वातावरण बनाए रखने के लिए उपरोक्त दो सत्यों का बोध व आचरण होना परम आवश्यक है। साथ ही, और दो सार्वभौमिक मान्यताओं को भी ध्यान में रखने की जरूरत है।पहला, सिर्फ भौतिक सत्ता, शक्ति, साधन, संसाधन आदि को ही एक स्वस्थ, सुखी व सुरक्षित जीवन या समाज का आधार न समझें, बल्कि सहायक उपकरण के रूप में इनका सदुपयोग करें। नश्वर सांसारिक सुख सुविधाओं का मोहताज हो कर नहीं, अपितु उनका मालिक बन कर उनको सेवा में लगाने से ही सच्ची सुख शांति व तृप्ति की प्राप्ति होती है। दूसरा, सभी प्राणी, प्रकृति, वनस्पति तथा मनुष्य आत्माओं के प्रति स्नेह, सम्मान, सद्भावना, सेवाभाव, सहयोग एवं सहायता आदि सत्कर्म ही श्रेष्ठ कर्म हैं, जो जीवन में सर्वांगीण स्वास्थ्य, सुख, शांति, समृद्धि व सच्ची सुरक्षा का आधार हैं। श्रेष्ठ कर्म से ही व्यक्ति श्रेष्ठ बनता है। शुभ चिंतन से ही एक ऐसी स्वस्थ मानसिक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो स्वयं या दूसरों की अशुभता से रक्षा करती है। शुभ चिंतन की भी दो मुख्य आधारशिला है। गहरा स्व चिंतन और स्नेह समर्पण से ईश्वर का चिंतन। यह सहज राजयोग की विधि भी है, जिससे हमारी अंतरात्मा, सभी के रूहानी पिता परमात्मा से निर्मल मन, बुद्धि और श्रद्धाभाव के साथ जुड़ जाती है।महात्मा गांधी ने प्लेग से मजदूरों की इस विधि से बचाई थी जानइस आध्यात्मिक योग विधि से, न केवल मन में सभी के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना और निःस्वार्थ सेवा प्रदान करने की शुभ वृत्ति जाग्रत होती है, अपितु भगवत गीता की ‘योगः कर्मेशु कौशलम’ उक्ति के अनुरूप हमारे प्रत्येक कर्मव्यवहार में भी पूर्ण कुशलता, शालीनता एवं सफलता की अनुभूति होती है। यह रूहानी ज्ञान और राजयोग ध्यान की सुखद व कारगर प्रक्रिया से ही हमें एक सुंदर जीवन, बेहतर समाज एवं सुखमय संसार बनाने की आत्मिक शक्ति, साहस व प्रेरणा मिलती है।


Source: Navbharat Times May 07, 2020 05:03 UTC



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