आचार्य नन्दकिशोर श्रीमालीकठिन समय में सकारात्मक कैसे रहें? प्रश्न गंभीर है और इसका उत्तर उसी के पास है जो अपने आपको जीवन पथ पर अकेला नहीं समझता है। ‘जमाना खराब है, संभल कर रहो।’ यह सीख आपको हमेशा बड़े-बुजुर्ग, दोस्त, सहकर्मी देते हैं। एक-दूसरे से विदा लेते हुए भी हम कहते हैं, अपना ध्यान रखना। इस कथन में भी अपने प्रियजन के प्रति चिंता प्रकट होती है, जो कई मायनों में हमारे समाज की बढ़ी हुई नकारात्मकता को सूचित करता है। इससे कोई अछूता नहीं है। अखबार की सुर्खियों या टीवी पर आने वाली अधिकांश खबरों में दुख, कठिनाइयां, विपदाएं, मनुष्य के हिंसात्मक व्यवहार का बोलबाला है।शिवजी ने देवी पार्वती को बताए थे कलियुग के ये राज, देखें कितना सचयकीन मानिए ये सारे नकारात्मक संवाद आपको गहराई तक प्रभावित करते हैं जिनकी अभिव्यक्ति उस समय सुस्पष्ट होती है जब आप जीवन में किसी मुश्किल में फंस गए होते हैं। अब ऐसी कोई जिंदगी तो है नहीं जो बाधाओं से अछूती हो। समस्याओं को लेकर ईश्वर ने कोई कोताही नहीं की है और हरेक के हिस्से में समस्याएं आई हैं। दुष्कर परिस्थितियों का सामना करते हुए आशावान रहना अत्यंत कठिन है। हालांकि मोटिवेशनल गुरुओं द्वारा आशावान रहने की शिक्षा बहुतायत से दी जाती है। परंतु जब जीवन में अपेक्षानुरूप कुछ भी नहीं हो रहा हो उस समय हिम्मत, उत्साह बनाए रखना माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने जितना मुश्किल काम हो जाता है। उम्मीद के दीपक जलते रहें, इसके लिए उम्मीद की बाती भी तो चाहिए। आस से ही आस की डोर बंधती है मगर कई बार परिस्थितियां इतनी विकट हो जाती हैं कि कुछ भी सोचे अनुसार नहीं होता। इस समय आशावान बने रहने के लिए व्यक्तित्व में आमूल-चूल बदलाव की आवश्यकता है। आपको स्वयं को रूपांतरित करना होगा। फिर निराशा, नकारात्मकता आपके व्यक्तित्व को छू भी नहीं सकेंगी।घृणा और मोह को ऊर्जा पुरानी यादों से मिलती है। पहले की सारी दुखदायी बातों से घृणा का संबंध है और मोह भूत और भविष्य दोनों के बीच झूल रहा होता है। मोह को बीते हुए सुखदायी पलों से लगाव है और भविष्य में उसका बसेरा है। भविष्य में ही आशा का भी निवास है। यानी आने वाला कल बीते हुए कल से बेहतर होगा यह विचार मात्र आशा को अनुप्राणित करता है। बात फिर वही होगी उम्मीद बांधने के लिए भी उम्मीद चाहिए जो भविष्य की सुंदर कल्पना प्रदान करती है।शिवपुराण की ये बातें जान लेंगे तो यमलोक का मुंह नहीं देखना पड़ेगाछांदोग्य उपनिषद् में प्रसंग है कि नारद जी ने ब्रह्मा पुत्र सनत कुमार से यह प्रश्न पूछा, ‘समग्र वेदों और शास्त्रों के ज्ञान के बाद भी मैं शोक से मुक्त नहीं हुआ। मैंने महात्माओं से सुना है- जो आत्मा को जान जाता है, वह शोक से परे चला जाता है। नारद को ग्लानि थी कि समग्र शास्त्रों ने उन्हें किताबी ज्ञान भरपूर दिया, निराशा फिर भी बरकरार है। सनत कुमार नारद की समस्या का निराकरण करते हुए कहते हैं कि आपने शरीर को सब कुछ मान लिया है, पर वास्तव में ‘आत्मवैदं सर्वम्’। जो आत्मा को सब कुछ मान लेता है उसे हर व्यक्ति में आत्मा का ही प्रकाश दिखाई देता है। दूसरों के विचारों, अन्य की धारणाओं से मन को मुक्त करते ही आप मन की आंखों से आत्मा का दर्शन करते हैं। जो सजग है और पूर्वाग्रह से दूर है, निराशा खुद-ब-खुद उससे दूर चली जाती है।
Source: Navbharat Times July 24, 2020 05:37 UTC