-अनुप्रिया भटनागरउत्तर: सद्गुरुश्री कहते हैं कि संदर्भ के लिए गणेश तंत्र के अनुसार भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी तक मिट्टी की रक्त वर्णिय गणेश प्रतिमा के समक्ष ‘वक्रतुण्डाय हुम’ या ‘हस्तिपिशाचिलिखे स्वाहा’ का ‘विधिवत’ कम से कम सवा लाख जाप (कलयुग में चार गुना अधिक यानि पांच लाख) और जीरे व काली मिर्च से दशांश हवन भौतिक सुख, शांति, आनंद और संपदा देने वाला कहा गया है। पर इसका प्रयोग गुरु सानिध्य के बगैर नहीं करना चाहिए। सनद रहे कि सही दिशा में अनवरत श्रम का कोई विकल्प नहीं है।प्रश्न: प्रेत और पितृ में क्या कोई समानता है? -पांडुरंग वराडकरउत्तर: सद्गुरुश्री कहते हैं कि हमारी यह देह पंच तत्वों की स्थूल देह है। इसके इतर सत्रह तत्वों का लिंग शरीर, नौ तत्वों की सूक्ष्म देह और पांच तत्वों की कारण रचना की पुष्टि आध्यात्मिक मान्यताएं करती हैं। आध्यात्म के अनुसार एक स्थूल देह के अंत के बाद दशविधि और त्रयोदश कर्म-सपिण्डन तक दिवंगत आत्मा एक अस्थायी देह में होती है, और इस छूट रहे जगत का सूक्ष्म अवलोकन करती है, जिसे वह भूलवश अपना समझ बैठी थी। उस देह को ही प्रेत शरीर कहते हैं। इसको ऐसे समझें कि एक स्थूल जीवन में बने प्रियजन रिश्तों व प्रिय वस्तुओं बिछड़ने की स्थिति प्रेत है। पंचभूत जीवन के त्याग के बाद भी आत्मा के इर्द-गिर्द तृष्णा, क्षुधा, काम, कामना, वासना, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार, शेष रह जाता है। सपिण्डन के पश्चात रूह जब अस्थायी प्रेत शरीर से कर्मानुसार नई देह और नए जीवन की ओर अग्रसर होती है, पितृ कही जाती है।प्रश्न: क्या पितृपक्ष या नवरात्रि में दाढ़ी व बाल नहीं कटवाने चाहिए? -आदित्य डागाउत्तर: सद्गुरुश्री कहते हैं कि श्रावण, पितृपक्ष और नवरात्रि में केश कर्तन न करने का कोई आधार प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता है। ये सुनी सुनाई दंत कथाओं या किसी के अनुभव से प्रेरित होकर बाद में प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। इनका कोई सुदृढ़ आधार नहीं है।प्रश्न: मैं सुरैया साधना के बारे में जानना चाहती हूं? यह क्या है? -अनिता सिंहउत्तर: सद्गुरुश्री कहते हैं कि जीवन को सुर में ढालने की साधना को सुरैया साधना कहते हैं। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक यानि लगभग 16 दिनों की यह उपासना का काल इस वर्ष 25 अगस्त से 10 सितंबर 2020 के मध्य घटित हो रहा है। यह साधना हमारे भौतिक व आर्थिक अभाव को मिटाने में सहायक सिद्ध होती है, ऐसा मैं नहीं, मान्यताएं कहती हैं। यह यक्ष-यक्षिणियों को प्रसन्न करने की साधना मानी जाती है, क्योंकि आध्यात्मिक मान्यताओं में यक्ष व यक्षिणी ही भौतिक संसाधनों के नियंत्रक जाते हैं। संदर्भ के लिए कुबेर यक्ष और लक्ष्मी यक्षिणी हैं। पर किसी गुरु या संबुद्ध मार्गदर्शक के बगैर इस साधना को संपादित नहीं करना चाहिए। ध्यान रहे, सही दिशा में अनवरत सटीक कर्म का कोई विकल्प नहीं है।अगर, आप भी सद्गुरु स्वामी आनंद जी से अपने सवालों के जवाब जानना चाहते हैं या किसी समस्या का समाधान चाहते हैं तो अपनी जन्मतिथि, जन्म समय और जन्म स्थान के साथ अपना सवाल saddguru@gmail.comपर मेल कर सकते हैं।सद्गुरुश्री स्वामी आनंदजी
Source: Navbharat Times August 30, 2020 01:41 UTC