समाचार4मीडिया (samachar4media) ने पत्रकारिता के विभिन्न आयामों पर चर्चा करने और चुनौतियों की पहचान करने के लिए एक सितबंर को दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर में 'मीडिया संवाद 2023' कार्यक्रम का आयोजन किया, जहां विभिन्न पैनल पर चर्चा की गई। इस दौरान 'दैनिक भास्कर' के एडिटर लक्ष्मी प्रसाद पंत ने मीडिया के बदलते हुए परिदृश्यों और उनसे जुड़ी विभिन्न चुनौतियों के बारे में चर्चा की।इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत ने कहा कि करीब बाइस साल पहले जब मैं पत्रकारिता में आया था, तब भी हमारे सीनियर्स बोलते थे कि पत्रकारिता का संकट काल चल रहा है और आज भी यह विषय हमारे सामने है। मीडिया के सामने आ रही चुनौतियों को यदि मैं एक लाइन में समेटने की कोशिश करूं मुझे केदारजी की कविता याद आती है कि- 'चुप्पियां बढ़ती जा रही हैं उन सारी जगहों पर, जहां बोलना जरूरी था...' एक ये चेहरा है। लेकिन जो आज की पत्रकारिता है, वह रोमांच और चुनौती दोनों दौर से गुजर रही है। व्यक्तिगत तौर पर तो मुझे यह भी लगता है कि आज की पत्रकारिता एक सांस्कृतिक थकान के दौर से भी गुजर रही है। न्यूजरूम के भीतर और बाहर, अलग करने की जो बैचेनी है, छटपटाहट है, जो जिद है, वो खबरों को हांपने की स्थिति तक ला चुकी है। हम सभी ने देखा है कि न्यूजरूम में किस तरह से चीजें बदल रही हैं।उन्होंने कहा कि चुनौती इस बात की भी है कि खबरें किस तरह से एक विचारधारा में सिमटती जा रही हैं। पत्रकारों ने अपनी पसंद के रंग भी चुन लिए हैं। वहीं सबसे बड़ा संकट, जिससे हम सभी रूबरू भी होते हैं, वह है 'विश्वसनीयत का संकट'। हर मीडिया समूह के सामने जो चुनौती है वह ये कि किस मीडिया समूह को हम विश्वसनीय मानें। न्यूजरूम में सबसे ज्यादा बेचैनी, सबसे ज्यादा बहस और सबसे ज्यादा छटपटाहट इसी शब्द को लेकर होती है।वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत ने आगे कहा कि एक दूसरा पक्ष ये भी है कि पत्रकारों से ज्यादा सूचनाएं पाठकों के पास हैं। मिनी सेकेंड में खबरें लोड हो रही हैं। एक उदाहरण के तौर पर देखें तो जयपुर की आबादी है पैंसठ से सत्तर लाख के आस पास। लगभग पचास लाख लोगों के पास स्मार्टफोन्स हैं। वहीं जयपुर में जो हमारे पत्रकार काम करते हैं, उनकी संख्या लगभग सौ है। अब बताइए सौ लोग पचास लोगों का मुकाबला कैसे कर सकते हैं। इसलिए टेक्नोलॉजी ने मीडिया के सामनें एक यह भी चुनौती खड़ी की है। एक अन्य संकट ये भी है कि करीब चार सौ चैनल्स हैं, करीब बीस हजार से ज्यादा अखबार रजिस्टर्ड हैं, पर खबरें नहीं हैं। टीवी की स्क्रीन लगातार छोटी होती जा रही है। खिड़कियां इतनी खुल गईं हैं कि छत्तीस पत्रकार तो एक साथ स्क्रीन पर नजर आ जाते हैं।अपनी बात रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि कोविड के दौरान ये लगने लगा था कि अखबार अब खत्म हो जाएंगे। उस दौरान दैनिक भास्कर की सर्कुलेशन भी आधी से कम हो गई थी। उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर समझें तो हमारे ग्रुप की जो सर्कुलेशन थी वह 65 लाख के करीब-करीब थी, लेकिन कोविड के दौरान यह 20 से 30 लाख के आस-पास रह गई थी। उस समय ये लगने लगा था कि सबकुछ खत्म होने वाला है और अखबार तो बिल्कुल ही खत्म होने वाले हैं। लेकिन कोविड के दौरान पत्रकारों ने जो काम किया, प्रिंट मीडिया ने जो काम किया, दैनिक भास्कर ने जो काम किया, वह सरहनीय है। आप कल्पना नहीं कर सकते हैं कि आज जिस समय ये बात कर रहा हूं उस समय दैनिक भास्कर की सर्कुलेशन कोविड के पहले के समय जो थी, उससे भी आगे चली गई है। कोविड से पहले और कोविड के बाद एक बहुत बड़ा दायरा खड़ा हो गया है।वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत का पूरा वक्तव्य आप नीचे देख-सुन सकते हैं:
Source: NDTV September 08, 2023 13:14 UTC