(बाबू बताओ तो जरा कि इस बार मोदी जीत रहे कि शिबू।) उनका यह सवाल सुन आपको लगेगा कि ये राष्ट्रीय फलक को ध्यान में रखकर तो सियासी सवाल नहीं कर रहे, लेकिन नहीं। उन्हें तो दो ही नेता का नाम ठीक से पता है। वह हैं शिबू सोरेन और नरेंद्र मोदी। यही बात उन्हें परंपरागत वोटर भी बनाती है। परंपरागत वोटर, यानी उनके क्षेत्र में कौन खड़ा है, कौन नहीं, इसकी उन्हें जानकारी तक नहीं, बस जिसको देते आए थे, उसे देना है।हमने तो काम कर दियाघाटशिला विधानसभा क्षेत्र की और बढऩे पर वोटरों का उत्साह बढ़ता दिखा। लाइन लंबी होती जा रही थी। भदुआ गांव के पास बने बूथ पर मिले बुजुर्ग राजाराम मुर्मू उस समय ताजा-ताजा वोट देकर निकले थे। पूछने पर कि किसे वोट किए? क्या मिजाज है इलाके में? कौन जीत रहा? बताते कि जीते कोई, हमने तो काम कर दिया। पूछने पर कि क्या राम मंदिर... धारा 370...कश्मीर... का कुछ हल्ला है? सवाल सुन वह खुद प्रश्नवाचक नजर से देखने लगे। सकपका कर बोले-'चुल्हा ले ञाम आकादा।' (गैस सिलिंडर का लाभ मिला है।) बाकी किसी सवाल का जवाब नहीं दिया। कुल मिलाकर आदिवासी वोटरों के वोटिंग ट्रेंड में इस बार सीएनटी को लेकर सेंटीमेंट दिखा तो उज्ज्वला के सिलिंडर की सेंधमारी भी दिखी। वोटर सीधे हैं। इनमें से कुछ ने सेंटीमेंट के साथ वोट किया तो कुछ ने परंपरागत और बाकी मन की मुट्ठी बंद कर अपनी-अपनी पसंद के हिसाब से।Posted By: Rakesh Ranjanअब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप
Source: Dainik Jagran December 08, 2019 05:19 UTC