Hindi NewsLocalRajasthanBikanerOn The Lines Of Pakistan's Multan, Narsingh Mela, Being Held In Bikaner For Hundreds Of Years, Has Been Reduced To Online This Time. Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐपOnline नृसिंह अवतार: पाकिस्तान के मुल्तान की तर्ज पर सैकड़ों सालों से बीकानेर में हो रहा नृसिंह मेला इस बार ऑनलाइन तक सिमट गयाबीकानेर 7 घंटे पहलेकॉपी लिंकमंगलवार शाम बीकानेर के एक मंदिर में सजी नर्सिंगावतार की झांकी।बैसाख सुदी नृसिंह चतुदर्शी बीकानेर में एक पर्व है लेकिन कोरोना इस पर्व को भी निगल गया। परकोटे के भीतर शहर के कई मोहल्लों में नृसिंह चतुदर्शी पर मेला नहीं भरा। न हिरण्यकश्यप गलियों में दौड़ता हुआ नजर आया और ना मोहल्लों के पाटों पर नृसिंह अवतार दिखाई दिया। इस बार मंदिर परिसर के भीतर ही हिरण्यकश्यप ने दौड़ लगाई और वहीं भगवान नृसिंह अवतार लिया और हिरण्यकश्यप का वध किया।वैसे तो बीकानेर शहर के लखोटियों चैक,डागा चैक, दुजारिया गली, नत्थूसर गेट के बाहर व लालाणी व्यास चैक में वैशाख सुदी चतुदर्शी की शाम को हर बार भगवान नृसिंह का अवतार होता है । लेकिन मरूनगरी में इस बार मेला कहीं नहीं भरा जाएगा, जिसके चलते हर साल साक्षी बनने के लिए ऑनलाइन का सहारा लिया। कई सोशल मीडिया पर इसका सीधा प्रसारण किया गया तो कई श्रद्धालुओं ने वीडियो को देखकर ही दर्शन किया। नृसिंह लीला के रूप में मनाये जाने वाले इस मेले का मुख्य आकर्षण लखोटिया चौक है जहां इस लीला को देखने जन सैलाब उमडता है । बीकानेर स्थापना से पूर्व इस चैक के ऐतिहासिक नृसिंह मन्दिर की स्थापना नागा साधुओ ने की । यह स्थल उस समय तलाई के रूप में था जहां नागा साधु निवास करते थे धीरे धीरे यहां अन्य लोग बसने लगें तो नागा साधु यहां से पलायन कर गये तब इस मंदिर की गद्दी लखोटियों जाति के परिवार ने सम्भाली।पाकिस्तान में भी होती थी नृसिंह लीलामुल्तान जो अब पाकिस्तान में है, भगवान नृसिंह की जन्म स्थली माना जाता है और यही एकमात्र स्थान था जहां भव्य नृसिंह लीला होती थी । जिसे देखने के लिए देश के अनेक हिस्सों से लोग जाया करते थे। लखोटिया जाति के ये व्यापारी भी मुल्तान में इस लीला को देखा करते थे उनके मन में इच्छा जागृत हुई कि क्यों न ऐसी लीला यहां इस नृसिंह मंदिर में भी प्रारम्भ की जाय उन्होंने इसके लिए तैयारियां भी प्रारम्भ कर दी लेकिन मुखौटो की समस्या रही यहाॅॅं मुल्तान जैसे मुखौटे तैयार करवाकर बीकानेर लाये । आज भी लीला के दौरान भगवान जैसे मुखौटे बनाने वाला कोई नही मिला और जो बनाये गये वो जचे नहीं तब ये लखोटिया व्यापारी काफी समय मुल्तान में रहकर वही की मिट्टी से नृसिंह व हिरण्य कश्यपु के मुखौटे तैयार करवाकर बीकानेर लाये। आज भी लीला के दौरान भगवान नृसिंह स्वरुप व हिरण्यसकश्यप स्वरुप धारण करने के जो मुखौटे है वे वही सैकडो वर्ष पुराने मुल्तान की मिट्टी के बने है। इन मुखौटों पर सोने की कलम का काम किया हुआ है जिसकी चमक वर्षों से आज भी बरकरार है इन्ही मुखौटो के कारण ये दोनो पात्र बडे आकर्षक लगते है जो वास्तविक दैत्य और नर-सिंह स्वरूप की अदभुत छटा बिखेरते है । इन्ही स्वरूपों को नजदीक से देखने के लिये हजारो की संख्या में लोगो की भीड उमडती है ।इस तरह होता है मेलालखोटिया चैक में सुबह से ही काले वस्त्र, हाथ में कौड़ा व राक्षसी मुखौटा पहना छोटा हिरणयकश्यपु का आंतक शुरू हो जाता है जो चौक व गलियो में उछलकुद करते हुवे अपने आंतक से हर किसी को डराता है। इस दौरान बड़ी संख्या में बच्चे हिरण्यकश्यप के पीछे दौड़ते हैं। शाम 5 बजे तक चलता है इसके बाद मेला धीरे धीरे अपने पूर्ण यौवन पर आता है । पांच बजे बाद पीला पिताम्बर, माथे पर चन्दन का लेप, गले मेें मोटो मिणियों की माला लेकर राम नाम का जाप करता नन्हा बालक भक्त प्रहलाद स्वरूप में चौक के पाटे पर रखी चांदी की कुर्सी पर विराजमान होता है । लोगो में भक्त प्रहलाद के पैर छू कर आर्शीवाद लेने की होड मच जाती है । वहीं कुछ ही समय पश्चात काले वस्त्र व दैत्य का मुखौटा घारण किया हिरण्यकश्यपु का बडा स्वरूप निकलता है जो फिर से अपना आंतक फैलाना शुरू कर देता है इसी दौरान खम्भ फाडकर आधा नर और आधा सिंह सा स्वरूप धारण करके भगवान नृसिंह प्रकट होते है तब चहू और नृसिंह देव की जय, प्रहलाद भक्त की जय के जयकारो का सिलसिला प्रारम्भ हो जाता है । उधर हिरण्यकश्यपु समूचे चौक में उछलकुद करके भक्त प्रहलाद पर प्रहार करने का प्रयास करता है जिसे बचाने के लिये नृसिंह भगवान पलट वार करते है तो हिरण्यकश्यपु भाग जाता है ।इस तरह भगवान नृसिंह और दैत्य हिरण्यकश्यपु के मघ्य तीन कुश्तियां होती है इस दौरान भगवान नृसिंह तख्त पर नाचते है। अन्तिम कुश्ती के दौरान भगवान नृसिंह दैत्य हिरण्यकश्यपु को अपने नाखुनो से चीर कर वध कर देते है उसी क्षण मोहल्ले की छतों से पुष्प वर्षा होती है।इसी मोहल्ले के कॅरियर काउंसलर डाॅ. चंद्रशेखर श्रीमाली ने बताया कि हिरण्यकश्यपु भक्त प्रहलाद व भगवान नृसिंह का स्वरूप मौहल्ले के ही जाये जन्में व्यक्ति धारण करते है अन्य नहीं । अब तक स्वयं डॉ. श्रीमाली के सहित अनेक मोहल्लावासी नृसिंह व हिरण्यकश्यपु का किरदार निभा चुके है । लेकिन इस बार जो भी पात्र बनने के इच्छुक उम्मीदवार थे, उन्हे अगले मेले तक इंतजार करना पड़ेगा क्योकि इस बार मेला आयोजित नहीं हुआ।
Source: Dainik Bhaskar May 25, 2021 15:02 UTC