भास्कर न्यूज, पिंपरी चिंचवड़। सदन में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के उद्देश्य से स्थानीय निकाय संस्थाओं में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू किया गया था। लेकिन वर्तमान चुनावी परिदृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि इस क्रांतिकारी कदम का लाभ कई दिग्गज राजनीतिक नेताओं ने केवल अपने ही घर की महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारने के लिए किया है। चुनावी मैदान में उम्मीदवार भले ही 'सौभाग्यवती' हों, लेकिन प्रचार की कमान पूरी तरह से उनके पति या बेटों के हाथों में है।- आरक्षण का फायदा, 'पतिराज' का कब्जामनपा चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का फायदा सीधे तौर पर उनके पति उठाते नजर आ रहे हैं। कई वार्डों में स्थिति ऐसी है कि महिला उम्मीदवार की जगह उनके पति ही प्रचार की धुरी संभाल रहे हैं। आलम यह है कि कुछ 'पतिराज' तो अपनी उम्मीदवार पत्नियों को प्रचार से दूर रखकर खुद ही मतदाताओं के बीच जा रहे हैं। राजनीतिक दलों ने टिकट देते समय महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय उनके पति या बेटे के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक वजन को अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि पहली बार घर से बाहर कदम रखने वाली महिला उम्मीदवारों में अक्सर जनता के बीच जाने में झिझक देखी जा रही है। चुनाव प्रचार के दौरान पति खुलेआम कह रहे हैं, "आरक्षण की वजह से पत्नी को टिकट देना पड़ा, लेकिन आपके सारे काम मैं ही करूंगा।" चुनाव जीतने के बाद भी वार्ड का नियंत्रण 'पतिराज' के पास ही रहने की पूरी संभावना बनी रहती है, जिससे राजनीति में पुरुषों का एकाधिकार बना हुआ है।- सोशल मीडिया और 'वॉर रूम' का सहारासमय कम होने के कारण उम्मीदवारों के पूरे परिवार अब सड़कों पर उतर आए हैं। वाट्सएप डीपी से लेकर फेसबुक तक, हर जगह चुनाव चिन्ह पहुंचाने के लिए 'वॉर रूम' से रात-दिन मेहनत की जा रही है। रात के अंधेरे में महिला बचत समूहों और सोसाइटियों की बैठकें की जा रही हैं। बैनर, पोस्टर और पर्चे बांटने की आपाधापी में लोकतंत्र का यह उत्सव अब पूरी तरह पारिवारिक प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है।
Source: Dainik Bhaskar January 08, 2026 09:48 UTC