बांदा में लॉकडाउन में कुछ अच्छा भी हुआ, जिसने दिल को छुआ - News Summed Up

बांदा में लॉकडाउन में कुछ अच्छा भी हुआ, जिसने दिल को छुआ


जागरण संवाददाता बांदा बीत रहा वर्ष-2020 भले ही संघर्षो से भरा रहा लेकिन इस वर्ष बहुत सजागरण संवाददाता, बांदा : बीत रहा वर्ष-2020 भले ही संघर्षो से भरा रहा लेकिन इस वर्ष बहुत से पल ऐसे भी रहे जो यादगार बन गए। घरों में रहकर लोगों ने बहुत कुछ सीखा तो ऐसे लोग जो अपनों के लिए कई वर्षो से अन्य राज्यों में रहकर काम कर रहे थे। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए कई वर्षो से अपनों के पास नहीं आए थे। वह लॉकडाउन के दौरान घर आ गए। और अपनों के बीच में खुशियां बांटते नजर आए। परिवार के ये पल बेहद अनमोल थे।बीत रहा वर्ष 2020 जिलेवासियों के लिए ऐतिहासिक रहा। जिसे कई पीढि़यां याद रखेंगी। वर्ष के शुरुआती दो माह तो बेहतर बीते। लोगों ने नव वर्ष के लिए तमाम सपने बुने और उन्हें पूरा करने का संकल्प लिया। जब सपने साकार करने का समय आया तो कोरोना ने दस्तक दे दी। जिला ही नहीं पूरा देश सिहर उठा। मार्च माह में 21 तारीख को प्रधानमंत्री कोरोना से बचने के लिए पहली बंदी घोषित की। इसमें हर व्यक्ति ने सहयोग दिया। ताली व थाली बजाकर घरों के बाहर दिए जलाए। फिर 23 मार्च से शुरू हुआ लॉकडाउन का दौर। कोरोना महामारी से बचने के लिए सभी लोग घरों में कैद हो गए। फिर दो-दो सप्ताह कर लॉकडाउन बढ़ता रहा। इस बीच हमेशा दूर रहने वाले सगे-संबंधी भी घर आ गए। वर्क फ्राम होम के तहत घर से काम और सामने अपना परिवार। एक-दूसरे का सुख-दुख, दर्द-तकलीफ साझा की। बाहर से लौटे लोगों के लिए तो यह पल बहुत खास बन गया। लंबे समय बाद एकजुट परिवार में रौनक दिखी।---------------------सामाजिक संगठन और संस्थाएं भी मदद में बढ़ीं आगेकोरोना संक्रमण के समय लॉकडाउन में मदद के लिए समाजसेवियों के हाथ बढ़े। व्यापार मंडल अध्यक्ष मनोज जैन की अगुवाई में व्यापारियों ने बेरोजगार व गरीबों तक राशन पहुंचाया। सपा के युवा नेता अचिन खरे ने युवाओं की टोली बना हर रोज जरूरमंदों तक राशन, कपड़े और दवाएं पहुंचाया। वहीं रोटी बैंक सहित कई संगठन कोरोना योद्धा बनकर खड़े हुए। त्रिवेणी गांव की समूह से जुड़ी माल्ती दीक्षित ने घर में ही तैयार कर हजारों लोगों को मुफ्त मास्क बांटे।------------घर में ही सब कुछ होने लगा ईजादलॉकडाउन के समय रेस्टोरेंट व फास्टफूड की दुकानें बंद रहीं। परिवार में बच्चों का शौक पूरा करने के लिए मां व बहनों ने घर में ही समोसा लेकर हर वह चीज बनाकर तैयार की, जो बच्चों व पति के पसंदीदा थे। बुजुर्गों के साथ बच्चों को समय मिला तो संस्कार सीखे। और भी कई अनुभव हासिल किए।--------------इंसान तो इंसान, जीवों की भी हुई फिक्रलॉकडाउन में सबसे ज्यादा बेजुबानों के सामने दिक्कत आई। बाजार व होटल, दुकानें बंद होने से सड़कों पर घूम रहे अन्ना गोवंश व कुत्तों के पेट भरने के लिए तमाम दानबीर सामने आए। बुंदेलखंड इंसाफ सेना के एएस नोमानी जानवरों के लिए मशीहा बने। सड़कों पर घूमने वाले इन बेजुबों के लिए चारा आदि का इंतजाम किया। इसमें उनकी पूरी टीम लगी रही।---------------नए नजरिए से देखने को मिली जिदगी इस वर्ष से हमने काफी कुछ सीखा। कोई नहीं जानता था कि कार्यालय के कार्य घर से होने लगेगा। यह हम सभी के लिए नया अनुभव रहा। यह अब अच्छा भी लगने लगा है। कोरोना ने कार्य करने क एक नई पद्धति को अपनाने का मौका दिया है।-रमाकांत अवस्थी, अतर्रा -सुख दुख जिदगी का हिस्सा है। इसका तो हर वर्ष हम लोग सामना करते हैं। ऐसे में यह वर्ष भी अन्य वर्षों की तरह ही रहा। इस वर्ष ने हमने सिखाया है कि विपरीत परिस्थिति में हिम्मत नहीं हारते हुए जिदगी को कैसे आगे बढ़ाना है। कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के दौरान परिवार के साथ रहने का मौका मिला। यह सबसे अच्छी बात रही। पूरा परिवार करीब दो महीने तक एक साथ रहा। बच्चों को यह अवसर अच्छा लगा।आशीष पांडेय, शिक्षक।डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस


Source: Dainik Jagran December 24, 2020 18:11 UTC



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